तसलीम ये के मिस्र का बाज़ार भी नहीं

तसलीम ये के मिस्र का बाज़ार भी नहीं

तसलीम ये, के मिस्र का बाज़ार भी नहीं!
ये गम भी कम नहीं के,खरीदार भी नही!

वे मुस्कुरा के चल दिये, मेरे सवाल पर !
इनकार गर नही है तो, इकरार भी नहीं !

दिल की कदूरतों नें सब आवाज़ छीनली!
जब कि सहन के बीच में दीवार भी नही!

पुरखाश थी पुरानी जो पत्थर बरस पडे !
हालां कि मेरा पेड समर दार भी नहीं!

पीरी में अब रिहाई किस काम की भला !
‘साबिर‘चमनमें अबतो कोई यार भी नही !

परि1472954_251502755014800_1028056022_n[1]चय :
नाम : साबिर अली ‘धानवी’
परिचय : साबिर अली यूपी के सहारनपुंर जिले के घाना खंडी के रहने वाले है। सन् 1969 में जन्मे साबिर अली पेषे से अध्यापक है। साबिर अली ने सन् 1990 से लेखन की दुनिया में कदम रखा। बिसरी यादें के नाम से धानवी साहब की किताब भी प्रकाषित हो चुकी है। उपरोक्त अंष उसकी किताब से     लिया गया है।

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