26 November 2020 , Thursday
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रिपोर्ट : समाचार TODAY
Official | गौतम बुद्ध नगर/नोएडा
हम किसी और के संसार में रहने लगे है.....

हम किसी और के संसार में रहने लगे है........

भारतीय मानस में सृष्टि के विकास के क्रम और उसमें मानवीय प्रयत्न और मानवीय ज्ञान- विज्ञान के स्थान की जो छवि अंकित है, वह आधुनिकता से इस प्रकार विपरीत है तो इस विषय पर गहन चिंतन करना पड़ेगा। यहां के तंत्र हम बनाना चाहते हैं और जिस विकास प्रक्रिया को यहां आरंभ करना चाहते हैं, वह तो तभी यहां जड़ पकड़ पाएगी और उसमें जनसाधारण की भागीदारी तो तभी हो पायेगी जब वह तंत्र और विकास प्रक्रिया भारतीय मानस और काल दृष्टि के अनुकूल होगी। इसलिए इस बात पर भी विचार करना पडे़गा कि व्यवहार में भारतीय मानस पर छाए विचारों और काल की भारतीय समझ के क्या अर्थ निकलते है? किस प्रकार के व्यवहार और व्यवस्थाएं उस मानस व काल में सही जंचते हैं? सम्भवत: ऐसा माना जाता है कि मानवीय जीवन और मानवीय ज्ञान की क्षुद्रता का जो भाव भारतीय सृष्टि-गाथा में स्पष्ट झलकता है, वह केवल अकर्मण्यता को ही जन्म दे सकता है पर यह तो बहुत सही बात है। किसी भी विश्व व काल दृष्टि का व्यवाहारिक पक्ष तो समय सापेक्ष होता है। अलग- अलग संदर्भों में अलग-अलग समय पर उस दृष्टि की अलग-अलग व्याख्याएं होती जाती हैं। इन व्याख्याओं से मूल चेतना नहीं बदलती पर व्यवहार और व्यवस्थाएं बदलती रहती हैं और एक ही सभ्यता कभी अकर्मण्यता की और कभी गहन कर्मठता की ओर अग्रसर दिखाई देती है। भारतीय परंपरा में किसी समय विधा और ज्ञान का दो धाराओं में विभाजन हुआ है। जो विधा इस नश्वर सतत परिवर्तनशील, लीलामयी सृष्टि से परे के सनातन ब्रह्म की बात करती है। उस ब्रह्म से साक्षात्कार का मार्ग दिखाती है वह परा विधा है। इसके विपरीत जो विधाएं इस सृष्टि के भीतर रहते हुए दैनंदिन की समस्याओं के समाधान का मार्ग बतलाती हैं। साधारण जीवन-यापन को संभव बनाती हैं। वे अपरा विधाएं है। और ऐसा माना जाता है कि परा विधा, अपरा विधाओं से ऊंची है। अपरा के प्रति हेयता का भाव शायद भारतीय चित्त का मौलिक भाव नहीं है। मूल बात शायद अपरा की हीनता की नहीं थी। कहा शायद यह गया था कि अपरा में रमते हुए यह भूल नहीं जाना चाहिए कि इस नश्वर सृष्टि से परे सनातन सत्य भी कुछ है। इस सृष्टि में दैनिक जीवन के विभिन्न कार्य करते हुए परा के बारे में चेतन रहना चाहिए। अपरा का सर्वदा परा के आलोक में नियमन करते रहना चाहिए। अपरा विधा की विभिन्न मूल संहिताओं में कुछ ऐसा ही भाव छाया मिलता है। पर समय पाकर परा से अपरा के नियमन की यह बात अपरा की हेयता में बदल गई है। यह बदलाव कैसे हुआ इस पर तो विचार करना पडे़गा। भारतीय मानस व काल के अनुरूप परा और अपरा में सही संबंध क्या बैठता है, इसकी भी कुछ व्याख्या हमें करनी ही पड़ेगी। पर यह ऊंच-नीच वाली बात तो बहुत मौलिक नहीं दिखती। पुराणों में इस बारे में चर्चा है। एक जगह ऋषि भारद्वाज कहते है कि यह ऊंच-नीच वाली बात कहां से आ गई? मनुष्य तो सब एक ही लगते है, वे अलग-अलग कैसे हो गए? महात्मा गांधी भी यही कहा करते थे कि वर्णो में किसी को ऊंचा और किसी को नीचा मानना तो सही नहीं दिखता। 1920 के आस-पास उन्होंने इस विषय पर बहुत लिखा और कहा। पर इस विषय में हमारे विचारों का असंतुलन जा नहीं पाया। पिछले हजार दो हजार वर्षों में भी इस प्रश्न पर बहस रही होगी। लेकिन स्वस्थ वास्तविक जीवन में तो ऐसा असंतुलन चल नहीं पाता। वास्तविक जीवन के स्तर पर परा व अपरा के बीच की दूरी और ब्राह्मण व शूद्र के बीच की असमानता की बात भी कभी बहुत चल नहीं पाई होगी। मौलिक साहित्य के स्तर पर भी इतना असंतुलन शायद कभी न रहा हो। यह समस्या तो मुख्यत: समय-समय पर होने वाली व्याख्याओं की ही दिखाई देती है। पुरूष सूक्त में यह अवश्य कहा गया है कि ब्रह्म के पांवों से शूद्र उत्पन्न हुए, उसकी जंघाओं से वैश्य आए, भुजाओं से क्षत्रिय आए और सिर से ब्राह्मण आए। इस सूक्त में ब्रंह्म और सृष्टि में एकरूपता की बात तो है। थोड़े में बात कहने का जो वैदिक ढंग है उससे यहां बता दिया गया है कि यह सृष्टि ब्रह्म का ही व्यास है, उसी की लीला है। सृष्टि में अनिवार्य विभिन्न कार्यो की बात भी इसमें आ गई है। पर इस सूक्त में यह तो कहीं नहीं आया कि शूद्र नीचे है और ब्राह्मण ऊंचे है। सिर का काम पांवों के काम से ऊंचा होता है। यह तो बाद की व्याख्या लगती है। यह व्याख्या तो उलट भी सकती है। पांवों पर ही तो पुरूष धरती पर खडा़ होता है। पांव टिकते हैं तो ऊपर धड़ भी आता है हाथ भी आते हैं। पांव ही नहीं टिकेंगें तो और भी कुछ नहीं आएगा। पुरूष सूक्त में यह भी नहीं है कि ये चारों वर्ण एक ही समय पर बने। पुराणों की व्याख्या से तो ऐसा लगता है कि आरंभ में सब एक ही वर्ण थे। बाद में काल के अनुसार जैसे-जैसे विभिन्न प्रकार की क्षमताओं की आवष्यकता होती गई, वैसे-वैसे वर्ण- विभाजित होते गए। कर्म और कर्मफल के इस मौलिक सिद्धांत का इस विचार से तो कोई संबंध नहीं है कि कुछ कर्म अपने आप में निकृष्ट होता है और कुछ प्रकार के काम उत्तम। वेदों का उच्चारण करना ऊँचा काम होता है और कपडा़ बुनना नीचा काम, यह बात तो परा-अपरा वाले असंतुलन से ही निकल आई है। और इस बात की अपने यहाँ इतनी यांत्रिक-सी व्याख्या होने लगी है कि बड़े-बड़े विद्वान भी दरिद्रता, भुखमरी आदि जैसी सामाजिक अव्यवस्थाओं को कर्मफल के नाम पर डाल देते हैं। श्री ब्रह्मा नंद सरस्वती जैसे जोशीमठ के ऊंचे शंकराचार्य तक कह दिया करते थे कि दरिद्रता तो कर्मो की बात है। करूणा, दया, न्याय आदि जैसे भावों को भूल जाना तो कर्मफल के सिद्धांत का उद्देश्य नहीं हो सकता। यह तो सही व्याख्या नहीं दिखती। कर्मफल के सिद्धांत का अर्थ तो शायद कुछ और ही है। क्योंकि कर्म तो सब बराबर ही होते हैं। लेकिन जिस भाव से, जिस तन्मयता से कोई कर्म किया जाता है वही उसे ऊंचा और नीचा बनाता है। वेदों का उच्चारण यदि मन लगाकर ध्यान से किया जाता है तो वह ऊंचा कर्म है। उसी तरह मन लगाकर ध्यान से खाना पकाया जाता है तो वह भी ऊंचा कर्म है। और भारत में तो ब्राह्मण लोग खाना बनाया ही करते थे। अब भी बनाते हैं। उनके वेदोच्चारण करने के कर्म में और खाना बनाने में बहुत अंतर है। पर वेदोच्चारण ऐसा किया जाए जैसे बेगार काटनी हो, या खाना ऐसे बनाया जाये जैसे सिर पर पड़ा कोई भार किसी तरह हटाना हो, तो दोनो की कर्म गडबड़ हो जाएंगे। परा-अपरा और वर्ण व्यवस्था पर भी अनेक व्याख्याऐं होंगी। उन व्याख्याओं को देख-परखकर आज के संदर्भ में भारतीय मानव व काल की एक नई व्याख्या कर लेना ही विद्वता का उददेश्य हो सकता है। परंपरा का इस प्रकार नवीनीकरण करते रहना मानस को समयानुरूप व्यवहार का मार्ग दिखाते रहना ही हमेशा से ऋषियों, मुनियों और विद्वानों का काम कर रहा है। -लेखक- Amkeshwar Mishra...

23 Oct 1K ने देखा
रिपोर्ट : स्निग्धा श्रीवास्तव
प्रोड्यूसर | नोएडा
समाज के मुंह पर तमाचा जडता समाज का ही दूसरा रूप!

समाज के मुंह पर तमाचा जडता समाज का ही दूसरा रूप!...

16 दिस्बर 2012 को एक दिल दहलाने वाली घटना...जिसे मात्र सुनने भर से रूह कांप जाती है....जीं हा हम बात कर रहे है निर्भया काण्ड की। 16 दिस्बर की यह घटना बार-बार यह दिलाती है कि किस तरह की अमानवीयता का शिकार हुइ एक लडकी। बात सिर्फ निर्भया की ही नहीं है...इससे पहले और अब तक आए दिन ना जाने कितनी निर्भया इस तरह की अमानवीयता का शिकार होती है। बलात्कार हमारे देश में सबसे बडी और गंभीर समस्या बनती जा रही है। हम आए दिन ऐसी घटनाओं को सूनते है। कभी किसी महिला का बलात्कार किसी सूनसान जगह पर किया जाता है तो कभी अकेले का फायदा उठाकर उसके अपने घर में ही उसे बलात्कार का शिकार बना लिया जाता है। ऐसी घटनाओं के बाद अक्सर लोगों के कहते सूना है कि जरूर उस लड़की की गलती होगी...उसने छोटे कपड़े पहन रखे होंगे या वो ल़ड़की बतचलन होगी .लेकिन आश्चर्य की बात है हमने कभी ऐसा नहीं सूना है कि कोई यह कहे उस पुरूष ने गलत किया या उसकी गलती होगी। गलती चाहे जिसकी भी हो इसका खामियाजा किसे भुगतना पडता है....जीं हां बलात्कार जैसी भयावह घटना के बाद पिडिता की हालत और मानसिक स्थिति का कोई भी अंदाजा नहीं लगा सकता है। अगर रेप के लिए सिर्फ महिला को जिम्मेदार माना जाता है...और उनके पहनावे व चाल-चलन को दोष दिया जाता है तो फिर उन मासूम बच्चियों का क्या दोष है जिनकी उम्र महज 6-7 वर्ष की होती है या वह फिर नाबालिग होती है। जी हां इस बात से कोई भी अनजान नहीं है कि हमारे देश में नवजात बेटी से लेकर महज 12-13 साल की बेटीयां भी रेप का शिकार होती है। अब सवाल यह उठता है कि वर्तमान समय में जहां बेटीयों को बेटो के बराबर का दर्जा दिया जा रहा है और हर क्षेत्र में अपना नाम कमा रहीं है वहां क्या ऐसी घटनाएं समाज को विचलित नहीं करती है। इसी समाज के उन पुरूषो की मानसिकता इतनी विकृत कैसे है? क्या उन्हें पुलिस प्रशासन या समाज का डर नहीं है या उन्हें समाज ही यह सब करने के लिए प्रेरित करता है, क्योकि वो भी तो इसी समाज के हिस्सा ही तो होते है। एक आंकडे के अनुसार देश में हर 14 मिनट पर एक महिला बलात्कार जैसी भयावह घटना का शिकार होती है। सन् 2014 में कुल 36,975 रेप के मामले दर्ज हुए थे। आपको बता दे कि लगभग हर 4 घंटे में एक गैंगरेप की वारदात होती है और हर 13 घंटे में एक महिला अपने किसी करीबी द्वारा रेप का शिकार होती है। इतना हीं नहीं हर 17 घंटे पर 6 साल तक की बच्चियां भी रेप का शिकार होती है। जुलाई में एक छह साल की लड़की को अगवा कर बलात्कार किया गया और दोषियों ने उसकी आंखों को गंभीर चोट पहुंचाई ताकि वो उन्हें पहचान न सके। यह घटना दिल को झकझोर देने वाली है, क्या इंसान इतना बेहरहम हो चुका है? राजधानी दिल्ली में ऐसा ही एक केस सामने आया जिसमें एक व्यक्ति ने 86 साल की बुज़ुर्ग महिला का बलात्कार किया और तो और अगस्त महीने में यूपी की एक 13 साल की लड़की का शव गन्ने के खेत में मिला जिसका बलात्कार हुआ था, उसके पिता ने आरोप लगाया कि बेटी की आंखें निकाल ली गईं थीं और ज़बान काटी गई थी। क्या रेप की इन घटनाओं की तरफ सरकार का रुख नहीं जाता? रेप मामले को लेकर अब तक भारत में ऐसी कोई व्यवस्था क्यों नहीं है? अपराधियों के हौसले इतने बुलंद क्यों है कि रेप की घटनाएं कम होने की बजाय बढ़ते जा रहे है? नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो के आंकड़ों के मुताबिक़ 2018 में 33,977 मामले पुलिस ने दर्ज किए यानी अब हर 15 मिनट में एक बलात्कार हो रहा था। यह आंकडे तो उन मामलो के है जिनकी रिकॉर्ड दर्ज होते है और सामने आती है, इसके अलावा ना जाने कितने मामले ऐसे होते है जो मामुली समझ कर पुलिस दर्ज ही नहीं करते है और हैरानी की बात तो यह कि हमारे समाज में आज भी ऐसी निदंनिय घटनाओ को मात्र लोक-लज्जा के कारण छिपा लिया जाता है। ऐसी घटनाओं को सूनकर और देखकर ऐसा प्रतीत होता है कि महिलाएं कहीं भी सूरक्षित नहीं है..चाहे वह घर से बाहर हो या अपने घर मे हो। आखिर हमारा समाज इतना कुंठित क्यों है कि महिलाए कहीं भी बीना किसी भय के रह सके? ऐसी घटनाओं के बाद अधिकत्तर महिलाओं को अपराधी द्वारा या तो मार दिया जाता है या महिलाएं खुद हीं अपने लिए मौत का रास्ता चुन लेती है। अपने ही समाज में अपने हीं लोगो के बीच रह कर क्यों महिलाओं को ऐसे अपराधो का सामना करना पड रहा है और कब तक वह इसका शिकार होती रहेंगी? इसका जवाब तो समाज ही दे सकता है। यह कैसा समाज है जो अपने ही बहन-बेटीयों की सूरक्षा नहीं कर सकता है। आखिर इन सबके लिए जिम्मेदार कौन है, पुलिस, पूरूष या महिलाएं? अपराधियों को क्या पुलिस प्रशासन का डर नहीं है? जिम्मेदार कोई भी है बलात्कार जैसी घटनाओं पर अंकुश लगाना बेहद आवश्यक है और इसके लिए सिर्फ पुलिस प्रशासन हीं नहीं समाज को भी आगे बढ़ना होगा। कहते अकेला चना भाड नहीं फोड सकता है इसलिए सभी को एक-साथ मिलकर इस पर विचार करना चाहिए और अगर हर पूरूष अकेली महिला को नुकसान पहुचांने की बजाय उसकी सूरक्षा करें तो निश्चित ही यह समस्या कम हो सकती है। इतना हीं नहीं महिलाओं को भी अपनी सूरक्षा के लिए खुद ही ठोस कदम उठाने होंगे और उन्हें हमेशा सचेत रहना होगा। देश में हर 15 मिनट में एक निर्भया अपना वजूद गंवा रही है, हर 15 मिनट में इंसानियत दम तोड़ रहीं है। कौन है जिम्मेदार? यह सवाल है देश की हर एक बेटी का- देश की सरकार से और समाज के हर उस हिस्से से जहां वह जन्म लेती है और समाज के हर क्षेत्र में पुरूषो के साथ खड़ी होकर समाज और अपने परिवार का नाम रौशन करती है। स्निग्धा श्रीवास्तव समाचार टुडे...

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रिपोर्ट : समाचार TODAY
Official | गौतम बुद्ध नगर/नोएडा
अयोध्याः महंत नृत्य गोपाल दास ने प्रधानमंत्री मोदी को भेजा पत्र

अयोध्याः महंत नृत्य गोपाल दास ने प्रधानमंत्री मोदी को भेजा पत्र...

राम नगरी अयोध्या में राम मंदिर निर्माण कार्य का उद्घाटन करने के लिए ट्रस्ट के अध्यक्ष महंत नृत्य गोपाल दास ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को निमंत्रण पत्र भेजा है। महंत नृत्य गोपाल दास ने कहा कि उन्होने पीएम मोदी को एक पत्र लिखा है, जिसमें उनसे अयोध्या का दौरा और राम मंदिर निर्माण कार्य का उद्घाटन करने का अनुरोध किया गया है। साथ ही उन्होंने कहा कि वह इसके ये भी सुनिश्चित करेंगे कि कोई भीड़ न हो। दरअसल महंत नृत्य गोपाल दास ने यह पत्र राम जन्मभूमि तीर्थ ट्रस्ट के महासचिव एवं विहिप के केंद्रीय मंत्री चंपत राय को दिया हैं। बताया जा रहा है कि मेल के माध्यम से यह पत्र चंपत राय ने प्रधानमंत्री तक भेज दिया है।...

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