अफसुर्दा तुझे जाने चमन देख रहा हूँ!

अफसुर्दा तुझे जाने चमन देख रहा हूँ!
क्यों चाँद के माथे पे शिकन देख रहा हूँ!

 

ए रिश्ते ग़म, फूट बहे दिल के फफोले!
बहते हुये असकों में जलन देख रहा हूँ!

मन्जिल पे कहां जायेगा, ये काफिला यारो
रहबर ही के कदमो मे थकन देख रहा हूँ!

अपनी खताओं का भी अहसास है मुझको!
कुछ आपकी नज़रों की चुभन देख रहा हूँ!

मुद्दत की तमन्ना का सिला अश्क हैं ‘साबिर‘!
अरमानों की सीने में घुटन देख रहा हूँ!

 

 

परिचय 1472954_251502755014800_1028056022_n[1]:
नाम : साबिर अली ‘धानवी’
परिचय : साबिर अली यूपी के सहारनपुंर जिले के घाना खंडी के रहने वाले है। सन् 1969 में जन्मे साबिर अली पेषे से अध्यापक है। साबिर अली ने सन् 1990 से लेखन की दुनिया में कदम रखा। बिसरी यादें के नाम से धानवी साहब की किताब भी प्रकाषित हो चुकी है। उपरोक्त अंष उसकी किताब से     लिया गया है।

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