‘जटिल पहेली’ मोदी का ‘कहीं पे निगाहें और कहीं पे निशाना’ !

कमलेश पण्डे

भाजपा नेता और देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अब देश ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया के लिए एक ‘जटिल पहेली’ बन चुके हैं। ‘कहीं पे निगाहें और कहीं पे निशाना’ वाली उनकी कार्यशैली और बेवाक विचारों ने न केवल स्वदेश बल्कि वैश्विक परिवेश में भी उनकी प्रासंगिकता को स्वतः सिद्ध कर दिया है। जो लोग यह सवाल उठा रहे हैं कि मोदी देश नहीं अपितु विदेश यात्राओं में ही सर्वाधिक व्यस्त रहते हैं, शायद उन्हें इन यात्राओं के आर्थिक और रणनीतिक महत्व का पता ही नहीं है, नहीं तो वे ऐसे अटपटे सवाल नहीं उठाते।

बहुत कम लोगों को यह पता होगा कि न्यूनतम संसाधनों से अधिकतम लाभ अर्जित करने वाली संघ की कार्यशैली को अपनाकर ही मोदी ने अबतक का अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन किया है और संभवतया अपने अनुगामियों से भी वे ऐसी ही उम्मीद भी रखते हैं! मोदी की क्या मुराद है, यह किसी से छिपा हुआ तथ्य नहीं है? यही वजह है कि देश ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया में उनके मुरीदों की संख्या में दिन-प्रतिदिन इजाफा ही हुआ है। जानकार बताते हैं कि उनकी लोकप्रियता का सेंसेक्स फ़िलहाल ऊपर की ओर ही जायेगा।

सवाल है कि आखिरकार ऐसी कौन सी खूबी मोदी के अंदर है जो कि देश-दुनिया के उनके समकालीन नेताओं में नहीं है। मेरा मानना है कि मोदी भले ही मनोवैज्ञानिक नहीं हैं, लेकिन इस विधा के सम्यक् अनुप्रयोग की कला में वे निष्णात हैं। इसी के सहारे उन्होंने पहले संघ को साधा और फिर भाजपा को। उसके बाद गुजरात के लिए उन्होंने क्या किया, यह किसी से छिपा हुआ तथ्य नहीं है। सौभागयवश जब से उनको देश की सेवा का मौका मिला है, तबसे उन्होंने पूरी दुनिया को साधने में भी कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी है।

दरअसल, इसके पीछे मोदी की दो रणनीति काम कर रही है- आर्थिक और सामरिक। पहले का नाता जहाँ लोगों के वर्तमान जीवन-यापन से है, वहीं दूसरे का नाता भविष्य में उत्पन्न होने वाली उन प्रतिरक्षात्मक चुनौतियों से जो कि ‘हिंदुत्व के अशवमेघ रथ’ के आड़े आएंगी । अबतक का सार यही है कि दोनों मोर्चे पर वो ‘मनोवैज्ञानिक युद्ध’ तो जीत चुके हैं और उनकी कोशिश भी यही है कि सरजमीनी युद्ध की नौबत ही न आये, विशेषकर पाक और चीन के साथ।

इस बात में कोई दो राय नहीं कि प्रधान सेवक नरेंद्र मोदी के ‘विदेश प्रवास’ का अपना महत्व है। इसके कूटनीतिक और राजनीतिक आयामों को तो समझा जा सकता है, लेकिन सामरिक, सांस्कृतिक और आर्थिक महत्व एवं इसकी जटिलताओं को समझना सबके लिए आसान नहीं है। यही वजह है कि ‘नासमझ’ लोग इन यात्राओं को लेकर ‘बेसिर-पैर’ की बातें ज्यादा कर रहे हैं!

यह दुर्भागयपूर्ण है कि इन चरणबद्ध विदेश यात्राओं को लेकर कई मीडिया माध्यमों की समझ भी ‘बचकाना’ है जिससे कई प्रकार के विरोधाभासों को बल मिल रहा है। लिहाजा मेरा मानना है कि सिर्फ आलोचना करने के लिए आलोचक बनना अच्छी बात नहीं है, बल्कि जनहित/राष्ट्रीय महत्व के विषयों पर समालोचना हो तो बेहतर रहेगा। वह भी नीर-क्षीर विवेक जैसा, जो कि प्रबुद्ध वर्ग का नैतिक दायित्व बनता है।

खैर, इस बात में कोई दो राय नहीं कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अगुवाई वाली राजग सरकार जिस तरह की आतंरिक और बाह्य चुनौतियों का सामना कर रही है, उसके पीछे पाक-चीन समेत कई पड़ोसी देशों की प्रत्यक्ष/परोक्ष भूमिका जगजाहिर है। लेकिन हैरत की बात तो यह है कि पहले रूस और अब अमेरिका जैसा हमारा ‘मददगार’ देश भी “कीप एंड बैलेंस” जैसी अपनी ‘क्षुद्र विदेश नीति’ से आगे की बात नहीं सोच पाये जिसमें सबका सामूहिक हित निहित हो।

संभवतया यह पहली सरकार है जो अपनी विदेश नीति को सर्वश्रेष्ठ प्राथमिकता दे रही है और अपने आचरण से यह साबित करने की कोशिश कर रही है कि भारत को अब और अधिक दिनों तक किसी का पिछलग्गू देश बनाकर नहीं रखा जा सकता है। इसी में परोक्ष रूप से ‘संघ’ और प्रत्यक्ष रूप से सरकार, दोनों का ‘हित’ निहित है।

आखिरकार सबको यह पता तो चलना ही चाहिए कि ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे सन्तु निरामया’ ही हमारी अनंतिम चाहत है। हमलोग सदैव से ही ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ के हिमायती रहे हैं। हमलोग हिंसा-प्रतिहिंसा मुक्त और आतंकवाद रहित समाज चाहते हैं। खुशी की बात है कि दुनिया के लोग मोदी के भाषणों को न केवल गौर से सुन रहे हैं, बल्कि उनके मुरीद भी बनते जा रहे हैं। विदेशी सरकारें और उनके प्रमुख लोग जिस तरह से मोदी जी की आवभगत कर रहे हैं, वह भारत और उसकी समदर्शी नीतियों का अद्भुत सम्मान है। ऐसा होना हम सबके लिए एक सुखद संकेत है।

यह कम आश्चर्यजनक बात नहीं है कि अपेक्षाकृत अपनी सरल और सहज विदेश नीति के माध्यम से मोदी सरकार ने ‘पूरब’ और ‘पश्चिम’ के देशों के बीच न केवल ‘सेतू’ बनने का काम किया है बल्कि अपने ‘मोहपाश’ में उन “गल्फ देशों” को भी बाँध लिया है जिसकी सम्भावना किसी को भी नहीं रही होगी। इससे दुनिया के महान से महानतम कूटनीतिज्ञ भी हैरत में पड़ गए हैं, लेकिन अब पछताए होत क्या जब ‘चिड़ियाँ’ चुग गई खेत। दरअसल उन कथित वैश्विक कूटनीतिज्ञों की परेशानी की वजह क्या है और क्यों है, इसे कोई अदना सा व्यक्ति भी समझ सकता है।

दिलचस्प बात तो यह है कि जो लोग कलतक भारत सरकार की ‘लुक ईस्ट नीति’ से परेशान रहा करते थे, उनकी आँखों की नींद हमारी नई नवेली ‘लुक गल्फ  नीति’ ने छीन ली है। यह मोदी सरकार की एक और मनोवैज्ञानिक जीत है जिसे देश-विदेश में काफी भुनाया जा सकता है। महान भारतीय राजनीतिज्ञ ‘चाणक्य’ और महाराजा रणजीत सिंह आज यदि होते तो क्या प्रतिक्रिया देते, इसे समझना कठिन नहीं है।

दरअसल ‘स्वदेश प्रेम’ और ‘विकास का अग्रदूत’ समझे जाने वाले ‘फायर ब्रांड हिन्दू नेता’ नरेंद्र मोदी ने प्रधानसेवक बनते ही जिस तरह से एक सख्त और संवेदनशील राजनेता के तौर पर दुनिया के लोगों के दिलोदिमाग में अपनी एक जगह बना ली है, और एक हद तक उनलोगों पर अपना मनोवैज्ञानिक असर डालने में कामयाब हुए हैं, वह काबिले तारीफ है। अपनी विदेश यात्राओं के दौरान जिस तरह से वो देश-विदेश के लोगों से घुल-मिल रहे हैं उससे ‘विश्व बन्धुत्व’ का भाव मजबूत हुआ है। यह न केवल देश बल्कि दुनिया के लोगों के लिए भी एक नया अहसास है।

 

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Social Media Auto Publish Powered By : XYZScripts.com