पदक की खातिर “दीपा कर्माकर” जोखिम में डाल दी थी अपनी जान

(पहलसिह सैनी)

दुसरे देशों के कांस्य पदक विजेता सोच रहें होगें कि हम भारत मे पैदा क्यों नही हुवे !!!!!
शर्म तो हमे आती ही नही ना ! क्या आपको पता है, देश के लिए एक पदक की खातिर  “दीपा कर्माकर” ने अपनी जान जोखिम में डाल दी थी ?
जी हाँ !!

हम 125 करोड़ हिन्दुस्तानियों की पदक की उम्मीदों के दबाव ने दीपा को ये सब करने को मजबूर होना पडा ! दीपा ने “प्रोदुनोवा वाल्ट” चुना था जिसे जिम्नास्टिक्स के इतिहास में आजतक सिर्फ 5 जिमनास्ट ही कर पायी हैं ! इसमें एक स्प्रिंग बोर्ड के प्लेटफार्म से हाथों से बेस बनाते हुए दो बार डबल समरसौल्ट करते हुए लैंडिंग करनी पडती है ! मैने भी ये गुगल पर जाना है !
ये इतना जोखिम भरा इवेंट होता है कि इसमें घातक चोट, पैरालिसिस या मौत हो सकती है !  इसीलिए कई बार इस इवेंट पर बैन लगाने की सिफारिश भी की गई है ( गुगल पर देखे ) !  फाइनल में आठ जिमनास्ट्स में से सिर्फ दीपा ने ही ये जोखिम लिया क्योंकि “प्रोदुनिवा” के जोखिम के स्तर को देखते हुए इसमें लगभग 7 या 8 अंकों की गारंटी होती है !
चीन, अमेरिका, कनाडा की जिमनास्ट ने ये जोखिम नही लिया !
जानते हो क्यों ? आपको लगेगा उनमे देश प्रेम नही होगा ?? उनमे मरने या चोटिल होने का डर होगा ? दीपा की तरह जज्बा नही होगा ??
जी नही, ऐसा नही है !
ये सभी नामी जिमनास्ट हैं , और उन देशों में उनकी एक कीमत है ! वें जानबूझ कर ये जोखिम नही लेते ! इनके ऊपर पूरे देश की उम्मीदों का दबाव नही होता ! वें पहले ही कई पदक जीत चुके होते हैं ! विकल्पों की कमी नही होती ! हमारी तरह नही, कि ले दे कर एक अंतरराष्ट्रीय जिमनास्ट और उसपर भी इतना दबाव हो कि वो “करो या मरो” के लिए तैयार हो जाए और दबाव मे उसकी प्रतिभा ही प्रभावित हो जाये !
दीपा चौथे स्थान पर आई ! केवल 0.15 जैसे मामुली अन्तर से पदक हाथ से छुट गया ! दरअसल ये हमारी खेल संस्कृति, सिस्टम और अफशर शाही की हार है ! क्योकि हमारे यहां लगभग हर क्षेत्र का संचालन ( किबोर्ड ) राजनीति से होता है !  इथिओपिया, कीनिया, कोसोवो जैसे अन्जान से देश मैडल जीत रहे हैं क्योंकि उनकी अपनी एक खेल संस्कृति और सिस्टम है ! जबकि  भारत में कोई खेल संस्कृति नही कोई सिस्टम नही !
125 करोड लोगों का देश और अभी तक शाक्षी और पीवी सिद्धु के दो पदक ! जबकि फ्लैक्स के अपने निजी तौर पर  22 पदक !
” शर्म तो हमे आती ही नही ना ”

हालांकि 125 करोड़ भारतीयों की उम्मीद पर खरा उतरना आसान नही होता ! भारतीय लोगों में खेलों के प्रति कोई दिलचस्पी नही और न ही खेल हमारी संस्कृति का हिस्सा बन पा रहें है ! जो मुट्ठीभर खिलाड़ी आ भी रहे हैं वो बहुत निचले तबके से आते हैं ! और वहां पर इनको तलाशने और तराशने में बहुत देरी हो जाती है ! हमारे देश में एक बड़ा खाता-पीता मध्य वर्ग भी है ! लेकिन उसकी ना खेलों में कोई दिलचस्पी है और ना ही समझ !
मध्य और उच्चवर्ग अपना भविश्य  सिर्फ IIT/IAS मे देखता है !

भारत दुनिया का एकमात्र देश है जहाँ खेलों से ना जुड़ने का एक बहाना बनाया जाता है कि ” खेलों में कैरियर नही है ” ! इन विद्वानों को कौन समझाये कि इथिओपिया, कीनिया, जमैका जैसे देशों में भी खेलों में कोई कैरियर नही है ! वहाँ लोग अपने लिए खेलों से जुड़ते हैं इस तरह लाखों खिलाड़ियों का “पूल” तैयार होता है ! कड़ी प्रतियोगितायें होती है, और चैंपियंस निकलते हैं ! भारत की तरह नही कि दीपा के बाद दूर-दूर तक कोई जिमनास्ट नही ! सानिया मिर्ज़ा को प्रैक्टिस के लिए भारत में कोई स्तरीय टेनिस खिलाड़ी नही मिलती !
125 करोड़ के देश में सिर्फ 11000 ही प्रशिक्षित खिलाड़ी हैं ! जबकि लगभग इतनी ही आबादी वाले चीन में ये संख्या करोड़ों में हैं !

हमारी आबादी के सौवें हिस्से के बराबर भयंकर अकाल और भुखमरी से जूझते इथिओपिया, गृह युद्ध से जूझते कोसोवो , यहाँ तक कि शरणार्थियों की टीम जिसका अपना झंडा तक नही है उन्होने भी मैडल जीते हैं !
और एक हम हैं,
क्योंकि शर्म तो हमे आती ही नही ना!!!

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