यूपी में 5000 साल पुरानी शाही कब्रगाह से मिला ऱथ

पहली बार किसी राजा की कब्रगाह मिली है. कब्र के साथ तांबे का रथ और तलवार भी मिली जो इसे मेसोपोटामिया की सभ्यता के बराबर खड़ा करती है. बागपत के सनौली गांव में पांच हजार साल पुरानी शाही कब्रगाह मिली है. इस कब्रगाह में मिले ताबूत और यहां रखी एतिहासिक चीजों को भारतीय पुरातत्व विभाग एक महत्वपूर्णखोज बता रहा है जो कई ऐतिहासिक मान्यताएं बदल देगा. दिल्ली से करीब 60 किलोमीटर दूर बागपत का सोनौली गांव, जहां जमीन के नीचे दफ्न 126 कब्रगाहें मिली हैं. ये कब्रें करीब पांच हजार साल पुरानी हैं.

पुरातत्वविदों द्वारा सोमवार को बताया गया कि पहली बार किसी कब्र से रथ भी मिला है. खुदाई मार्च 2018 में एसके मंजुल व सह-निदेशक अरविन मंजुल सहित 10 सदस्यों की एक टीम द्वारा शुरू की गई थी.

मंजुल ने बताया कि उस समय मेसोपोटामिया, जॉर्जिया और ग्रीक सभ्यता में रथ पाए जाने के प्रमाण मिलते हैं लेकिन अब भारतीय उप महाद्वीप में इसके साक्ष्य मिलने के बाद हम कह सकते हैं इन सभ्यताओं की तरह ही भारतीय उप महाद्वीप में भी लोग रथों का प्रयोग करते थे. इससे एक दूसरा तथ्य भी निकल के आता है कि पूर्व लौह युग में हम लोग लड़ाकू प्रजाति के थे.

एक बड़ा सवाल ये है कि अगर उस वक्त रथ था तो इसे खींचने के लिए किस जानवर का उपयोग किया जाता था बैल या घोड़ा? पुरातत्वविदों का मानना है कि ज़्यादा संभावना है कि इसे खींचने के लिए घोड़े का प्रयोग किया जाता रहा होगा.

खास बात है कि इस रथ की बनावट बिल्कुल वैसी ही है जैसे इसके समकालीन मेसोपोटामिया आदि दूसरी सभ्यताओं में था. इस रथ के पहिए की बनावट ठोस हैं इसमें तीलियां नहीं हैं. रथ के साथ पुरातत्वविदों को मुकुट भी मिला है जिसे रथ की सवारी करने वालों द्वारा पहना जाता रहा होगा.

रथों के बारे में वर्णन ऋग्वेद में मिलता है जिससे सिद्ध होता है कि दूसरी शताब्दी ईसा पूर्व में भारतीय उप महाद्वीप में रथ थे. ऋग्वेद में देवताओं जैसे उषा और अग्नि द्वारा रथ की सवारी का वर्णन है. मंजुल ने कहा कि ताम्र पाषाण युग में घोड़ों का प्रमाण मिलता है.

अगर इतिहास में जाएं तो हम पाते हैं कि मेसोपोटामिया, उत्तरी कॉकेशस व सेंट्रल यूरोप में 400 ईसा पूर्व में पहिए वाले वाहनों का प्रमाण मिलता है. लेकिन अभी भी यह तय नहीं हो पाया है कि पहली बार किस सभ्यता ने पहिए वाले वाहनों का निर्माण किया.

2005 में खुदाई के दौरान सिंधु घाटी सभ्यता से संबंधित 116 कब्रगाहें मिली थीं. पुरातत्वविद इस पर आगे और रिसर्च करना चाहते थे. इसलिए इस जगह से सिर्फ 120 मीटर की दूरी पर फिर से खुदाई की गई. इस खुदाई में रथ मिला. इस जगह पर 8 कब्रगाहों की खुदाई की गई. हर कब्रगाह लौह युग के बारे में अलग ही कहानी कहती है. इन कब्रगाहों से उस काल के लोगों के रहन-सहन, संस्कृति, कला का पता चलता है.

इन कब्रगाहों में कंकाल, मिट्टी के बर्तन, तलवार, टॉर्च व रथ मिले हैं. ताबूतों पर तांबे से नक्काशी की गई थी. इससे पता चलता है कि इस सभ्यता के लोग कला के साथ साथ तकनीकी रूप से भी एडवांस थे. इन प्रमाणों के मिलने के बाद घोड़ों के कंकालों का पता लगाने के लिए खुदाई की जाएगी. एक कब्र में कुत्ते का शव भी मिला है जो कि हिंदू पौराणिक चरित्र यम का वाहन है.

इतिहासकार डीएन झा का कहना है कि वैदिक काल में घोड़ों द्वारा खींचे जाने वाले रथों का वर्णन मिलता है. हालांकि लोहे का प्रमाण उत्तर वैदिक काल में मिलता है. कई विद्वानों ने महाभारत के समयकाल के बारे में लिखा है. लेकिन डीन झा का कहना कि उन्हें नहीं पता कि किसने रथ का प्रमाण महाभारत का समयकाल निर्धारित करने के लिए किया है.
 

 

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