आईवीएफ प्रकिया के अनछुए बिंदु: आईजेनोमिक्स

इन विट्रो फर्टिलाइजेशन (आईवीएफ) एक ऐसा जारिया है जिसमें असिस्टिड रीप्रडक्टिव टेक्नोलोजी (आर्ट ) से अण्डे और स्पर्म को लैबोट्ररी की निगरानी में रखा जाता है । जिसके बाद यूटरस में प्रत्यारोपित किया जाता है । बता दें कि बांझपन के विकारों का कारण क्षतिग्रस्त फैलोपियन ट्यूब, पुरुषों में स्पर्म की कमी, गर्भाशय फाइब्रॉएड, ओव्यलैशन ,मिसकैरेज और गर्भाशय संबंधी समस्याओं होती है जो कि आईवीएफ के माध्यम से मरीज को बांझपन के विकारों से मुक्ति दिलाया जा सकता है । इसके साथ ही आनुवांशिक बीमारियों से भी छुटकारा दिलाया जा सकता है । अगर आप आईवीएफ के बारे मे विचार कर रहे है तो आइए इसके बारे में विमर्श करते है जिससे आपकी प्रेग्नन्सी में आने वाली रुकावटों से बचा जा सके । उम्र : आईवीएफ की सफलता के लिए माता-पिता की उम्र का ध्यान रखना जरुरी है जिससे महिला और पुरुष के अंडे और स्पर्म नष्ट न हो ।

मेडिकल विशेषज्ञों का मानना है कि जैसे जैसे कपल्स की बढ़ती उम्र में उनके अंडे और स्पर्म की गुणवत्ता और तादाद में कमी आने लगती है जो कि आईवीएफ की प्रक्रिया में बाधा पैदा करती है । प्रकिया के दौरान महिला की उम्र 35 हो तो बच्चें के पैदा होने का सक्सेस रेट 40 प्रतिशत होगा जबकि 42 साल की महिला के लिए सिर्फ 4 प्रतिशत होगा । आईजेनोमिक्स के मुताबिक , अगर महिला की उम्र 38 साल है तो करीब 79 प्रतिशत एम्ब्रीओ में क्रोमोसोमल अनियमितताएं आने लगती है क्योंकि उम्र के इस पड़ाव पर शरीर में क्रोमोसोमल अनियमितताएं 30 प्रतिशत बढ़ जाती है । मिसकैरेज संबंधित विकार : आईवीएफ प्रकिया के अनुसार , पिछली स्वास्थय प्रेग्नन्सी में अपने पार्टनर के साथ सक्सेस रेट सकारात्मक रहा है लेकिन जब पार्टनर बदल जाते है तब सक्सेस रेट गिरने की संभावनाएं बढ़ जाती है । फर्टिलिटी में आने वाली दिक्कतें : आजकल के दौर में पुरुषों की दिनचर्या में बदलाव के चलते पुरुषों में भी इन्फर्टिलिटी जैसे विकारों ने घर बना लिया है क्योंकि कम शुक्राणु दर , गर्भाशय संबंधी समस्याएं और फाइब्रॉइड ट्यूमर आईवीएफ सफलता की दर में गिरावट दिखाई पड़ती है । जब नर और मादा दोनों इन्फर्टल हो तो प्रक्रिया की सफलता पर सवालिया निशान लग जाता है क्योंकि आईवीएफ की कामयाबी ओव्यलैशन , ओवेरीअन शिथिलता और आईएसएच का असर पड़ता है ।

दिनचर्या समस्या : जो महिलाएं आईवीएफ इलाज शुरु करने वाली होती है और जिनका आईवीएफ इलाज पहले भी फेल हुआ है तो उनको सख्ती से इलाज के 3 महीने पहले स्मोकिंग छोड़नी पड़ती है । जो महिलाएं ज्यादा सिगरेट पीती है उन्हें फर्टिलिटी दवाओं का डॉज भी ज्यादा देना पड़ता है जिससे महिला के अण्डाशय में प्रत्यारोपित किया जा सके । क्योंकि इलाज में एहतियात बरतना जरुरी है । प्री-इम्प्लैन्टैशन जेनेटिक स्क्रीनिंग (पीजीएस) परिक्षण के जरिए एम्ब्रीओ की स्क्रीनिंग की जाती है जिससे आईवीएफ ट्रीट्मेन्ट में साधारण क्रोमोसोम की शिनाख़्त की जा सके ।उसके बाद साधारण क्रोमोसोम को यूटरस में प्रत्यारोपित किया जाता है जिससे एक स्वस्थ बच्चा पैदा हो ।बता दें कि भ्रूण का चयन पीजीएस टेस्टिंग के जरिए आईवीएफ फिज़िशन और मरीजों को लेना होता है पीजीएस के फायदें • प्रत्यारोपण दर बढ़ाना • मिसकैरेज दर में गिरावट • स्वस्थ बच्चा पैदा करने के मौकों में • कम समय में गर्भावस्था पीजीएस एक तकनीक है जिससे मिसकैरेज होने की संभावना होती है । अगर आप आईवीएफ बच्चा प्लान कर रहे तो पीजीएस कराना मत भूलिएगा ।

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