एएमयू में जिन्ना की तस्वीर पर बवाल, देश भर में जिन्ना को लेकर छिड़ी बहस

कायद-ए-आजम जिन्ना एक बार फिर चर्चा में हैं। जिन्ना को इस दुनिया से गुजरे हुए सालों बीत चुके हैं। 13 साल पहले जब लालकृष्ण आडवाणी ने जिन्ना को धर्मनिरपेक्ष बताया था…तो जिन्ना को लेकर बहस छिड़ गई थी…किसी समय उग्र हिंदुत्व का चेहरा माने जाने वाले आडवाणी कहीं के नहीं रहे…जिन्ना ने उन्हें कहीं का नहीं छोड़ा…उन्हें बीजेपी के अध्यक्ष पद से इस्तीफा देने के लिए मजबूर होना पड़ा…अब जिन्ना को लेकर फिर से जंग छिड़ गई है…लेकिन इस बार मामला थोड़ा अलग है। विवाद की वजह  अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में टंगी हुई सालों पुरानी उनकी तस्वीर है। योगी सरकार के मंत्री स्वामी प्रसाद मौर्य ने उन्हें महापुरुष क्या बताया…कि जिन्ना को लेकर देश भर में बहस छिड़ गई। अलीगढ़ से बीजेपी सांसद सतीश गौतम ने विश्वविद्यालय प्रशासन को खत लिखकर जिन्ना की तस्वीर हटाने की मांग कर डाली। इसके बाद तो एएमयू जैसे जंग का अखाड़ा बन गया। कोई जिन्ना के समर्थन में तो कोई उनके विरोध में बयान देने लगा। AMU की नींव सन 1875 में सर सय्यद अहमद खान ने मुहम्मद एंग्लो ओरिएण्टल कॉलेज के रूप में रखी गई थी। 1884 में विभिन्न मुद्दों पर डिबेट के लिए एक क्लब की स्थापना की गई जो परिसर में ही स्ट्रेची हॉल में चलता था। इसे कैम्ब्रिज यूनियन सोसाइटी के मॉडल पर ही तैयार किया गया था। 1920 में जब ये यूनिवर्सिटी बनी तब महात्मा गांधी ने यहां का दौरा किया था और तब के छात्र संघ ने उनको आजीवन सदस्य बनाया था।  महात्मा गांधी AMU छात्र संघ के पहले आजीवन सदस्य थे। आजादी से पहले  सन 1938 में मोहम्मद अली जिन्ना AMU आये और उनको भी छात्र संघ ने अपना आजीवन सदस्य बनाया। 1947 में भारत दो भागों में बंट गया। लेकिन जिन्ना की तस्वीर एएमयू में लगी रही। प्रगतिशील, सुधारवादी और बुद्धिजीवी माने जाने वाले सर सैयद अहमद खान की पहल पर कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय की तर्ज पर ब्रिटिश राज में बनाया गया पहला उच्च शिक्षण संस्थान था। इसका मकसद मुसलमानों को आधुनिक शिक्षा देना था। खान अपने समय के सबसे प्रभावशाली मुस्लिम नेता थे और उन्होंने उर्दू को भारतीय मुसलमानों की सामूहिक भाषा बनाने पर जोर दिया था। पहले इस कॉलेज का नाम मुसलमान एंग्लो ओरिएंटल यानि एएमओ था…इसे ही बाद में अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी यानि एएमयू का नाम दिया गया।  1877 में बने MAO कॉलेज को विघटित कर 1920 में ब्रिटिश सरकार की सेंट्रल लेजिस्लेटिव असेंबली के एक्ट के जरिए AMU एक्ट लाया गया. संसद ने 1951 में AMU संशोधन एक्ट पारित किया, जिसके बाद इस संस्थान के दरवाजे गैर-मुसलमानों के लिए खोले गए. साल 1920 में एएमयू को केन्द्रीय विश्वविद्यालय का दर्जा दिया गया. विश्वविद्यालय से कई प्रमुख मुस्लिम नेताओं, उर्दू लेखकों और उपमहाद्वीप के विद्वानों ने विश्वविद्यालय से स्नातक की उपाधि प्राप्त की है। एएमयू से ग्रेजुएट करने वाले पहले शख्स भी हिंदू थे, जिनका नाम इश्वरी प्रसाद था. अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में शिक्षा के पारंपरिक और आधुनिक शाखा में 250 से अधिक कोर्स करवाए जाते हैं. विश्वविद्यालय के कई कोर्स में सार्क और राष्ट्रमंडल देशों के छात्रों के लिए सीटें आरक्षित हैं. औसतन हर साल लगभग 500 फॉरेन स्टूडेंट्स एएमयू में एडमिशन लेते हैं. यूनिवर्सिटी कुल 467.6 हेक्टेयर जमीन में फैली हुई है. सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने 1967 में अजीज पाशा मामले में फैसला देते हुए कहा था कि एएमयू अल्पसंख्यक संस्थान नहीं है, लेकिन 1981 में केंद्र सरकार ने कानून में जरूरी संशोधन कर इसका अल्पसंख्यक दर्जा बरकरार रखने की कोशिश की थी. उसके बाद इलाहाबाद हाई कोर्ट ने 2005 में एएमयू को अल्पसंख्यक का दर्जा देने वाला कानून रद कर दिया और कहा कि अजीज पाशा मामले में सुप्रीम कोर्ट का फैसला बिल्कुल सही है। एएमयू अपनी लाइब्रेरी के लिए भी जाना जाता है. बताया जाता है कि विश्वविद्यालय की मौलाना आजाद लाइब्रेरी में 13.50 लाख पुस्तकों के साथ तमाम दुर्लभ पांडुलिपियां भी मौजूद हैं. इसमें अकबर के दरबारी फैजी की फारसी में अनुवादित गीता, 400 साल पहले फारसी में अनुवादित महाभारत की पांडुलीपि, तमिल भाषा में लिखे भोजपत्र, 1400 साल पुरानी कुरान, सर सैयद की पुस्तकें और पांडुलिपियां वगैरह भी शामिल है. इस विश्वविद्यालय से भारत और पाकिस्तान की कई दिग्गज हस्तियों ने पढ़ाई की है. इसमें भारत के पूर्व राष्ट्रपति जाकिर हुसैन, पाकिस्तान के पहले प्रधानमंत्री लियाकत अली खान आदि शामिल हैं.हालांकि एएमयू अपनी खासियतों के साथ-साथ अपने विवादों के लिए भी जाना जाता है। ये वही एएमयू है जहां आरएसएस की शाखा लगने का विरोध हुआ था….महामहिम राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद के आगमन का विरोध हुआ था…हाल ही में छात्र संगठन एबीवीपी राजा महेंद्र प्रताप सिंह की जयंती एएमयू के गेट पर मनाने के लिए अड़ गया था. एबीवीपी का कहना था कि एएमयू के लिए राजा महेंद्र प्रताप सिंह ने अपनी जमीन दान दी थी और उनकी जयंती बनाई जानी चाहिए. बताया जाता है कि 1929 में राजा महेंद्र प्रताप ने 3.04 एकड़ जमीन इस विश्वविद्यालय को दे दी थी। अब एएमयू एक बार फिर चर्चा में है….जिन्ना की तस्वीर को लेकर…बीजेपी और हिंदूवादी संगठन तस्वीर हटाने की मांग कर रहे हैं तो एएमयू के छात्र संघ के सदस्य उनकी तस्वीर लगाए रखने के पक्ष में हैं।

अलीगढ़ से पंकज चौधरी के साथ समाचार टुडे के लिए रितेश झा की रिपोर्ट

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