लोकसभा चुनाव 2019: भाजपा की 18 राज्यों में सत्ता, लेकिन घटे 1 करोड़ वोट

2014 से अब तक 26 राज्यों में विधानसभा चुनाव हुए हैं। इस दौरान भाजपा ने 18 राज्यों में अकेले या समर्थन से सरकार बनाई, जबकि कांग्रेस या गठबंधन को सिर्फ चार राज्यों में सत्ता मिली। हालांकि, इस दौरान भाजपा के एक करोड़ से ज्यादा वोट घट गए। यानी जितने भाजपा को इन राज्यों में लोकसभा चुनावों में मिले, उतने विधानसभा चुनावों में नहीं। यहां 2014 के लोकसभा चुनावों में मिले वोटों की तुलना बाद के विधानसभा चुनावों से की है। पिछले विधानसभा चुनावों से नहीं।

देश का राजनैतिक मिजाज कुछ ऐसा हो गया है कि भले ही 2018 अभी आधा बीता हो, लेकिन सबका दिमाग 2019 के चुनाव पर अटक गया है। नरेंद्र मोदी सरकार ने चार साल में क्या हासिल किया, इसके ब्योरे से सरकारी विज्ञापन भरे पड़े हैं. सत्तारूढ़ बीजेपी ने अपने नेताओं को आम चुनाव की तैयारी के लिए अभी से जमीन पर उतार दिया है. उधर, विपक्ष की सारी कोशिश एक ऐसा बीजेपी विरोधी गठजोड़ बनाने की है, जो 2019 में देश का सियासी भूगोल बदल दे.

2014 के बाद जिन 26 राज्यों में विधानसभा चुनाव हुए उनमें से भाजपा ने 24 में चुनाव लड़ा। दो राज्यों- नगालैंड, पुड्डूचेरी में नहीं लड़ा। इनमें से 16 राज्यों में भाजपा के वोट कम हुए हैं। जबकि 8 राज्यों में भाजपा के वोट बढ़े हैं। इन आठ राज्यों में पार्टी को करीब 34 लाख वोट ज्यादा मिले।

इस दौरान हुए विधानसभा चुनावों में वोटर के मिजाज पर गौर करें तो बीजेपी के लिए बड़ी चुनौती दिखाई देती है. यह भी गजब का विरोधाभास है कि 2014 के बाद हुए विधानसभा चुनावों में बीजेपी एक के बाद एक राज्य में सरकार बनाती चली गई. और एक समय ऐसा आया कि देश के 21 राज्यों में या तो पार्टी की सरकार थी या फिर वह मुख्य गठबंधन सहयोगी थी. लेकिन दूसरा पक्ष यह है कि राज्यों में जीत के बावजूद अधिकतर राज्यों में बीजेपी का वोट प्रतिशत लोकसभा चुनाव की तुलना में विधानसभा चुनाव में घटता चला गया.

कर्नाटक में 2014 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी को 43.37 फीसदी वोट और 17 लोकसभा सीटें मिली थीं. विधानसभा चुनाव में बीजेपी का वोट बैंक घटकर 36 फीसदी रह गया. यानी पार्टी का 7 फीसदी वोट खिसक गया. यहां लोकसभा की तुलना में कांग्रेस का वोट भी 3 फीसदी गिरा और पार्टी को 38 फीसदी वोट मिले. राज्य विधानसभा चुनाव में सबसे ज्यादा वोटों का फायदा मुख्यमंत्री एच डी कुमारस्वामी के जनता दल सेकुलर को हुआ. जेडीएस का वोट 11 फीसदी बढ़कर 18 फीसदी हो गया.अब कांग्रेस और जेडीएस के बीच गठबंधन भी हो चुका है. यह बीजेपी के लिए चुनौती और बढ़ा देगा.

छह राज्यों को ऊपर के गुणा-भाग से बाहर रखना पड़ा है, क्योंकि इन राज्यों में लोकसभा चुनाव के बाद विधानसभा चुनाव नहीं हुए हैं. राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में जहां इस साल के अंत में चुनाव होंगे, वहीं आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और उड़ीसा में लोकसभा चुनाव के साथ विधानसभा चुनाव होने हैं. ऐसे में इन राज्यों को इस फॉर्मूले के तहत इस विश्लेषण में शामिल नहीं किया जा सकता.

हालांकि बीजेपी को इस बात का अंदाजा है कि राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में उसे पहले जैसा प्रदर्शन दुहराना मुश्किल होगा. उड़ीसा में बीजेपी जिस तरह मेहनत कर रही है, ऐसे में वह नवीन पटनायक के इस गढ़ में थोड़ी बहुत सेंधमारी कर सकती है. आंध्र और तेलंगाना के पत्ते खुलना अभी बाकी है. वहीं तमिलनाडु एक ऐसा राज्य है जहां बीजेपी और कांग्रेस दोनों की ही खास वजूद नहीं है.

विधानसभा चुनाव के नतीजों का लोकसभा चुनाव पर कोई असर होता है या नहीं. इस सवाल पर चुनाव सर्वेक्षण करने वाली प्रमुख एजेंसी सीएसडीएस के डायरेक्टर संजय कुमार कहते हैं, हां यह सच है कि लोकसभा चुनाव के बाद हुए विधानसभा चुनाव में बीजेपी के वोट घटे हैं. लेकिन यह कोई अनोखी घटना नहीं है. अगर कांग्रेस पुराने लोकसभा चुनाव और उनके बाद हुए विधानसभा चुनावों के परिणाम देखेंगे तो भी मिलत जुलता ट्रेंड मिलेगा. क्योंकि लोकसभा ज्यादा वोट पाने के बाद विधानसभा के चुनाव में कुछ एंटी इनकंबेंसी होती ही है. दूसरी बात यह कि विधानसभा चुनावों में स्थानीय मुद्दे और क्षेत्रीय  दल भी असर डालते हैं. जबकि लोकसभा में इनका असर उतना नहीं होता. ऐसे में विधानसभा चुनाव के परिणाम को न तो नजरंदाज किया जा सकता है और न ही लोकसभा चुनाव के लिए सटीक रुझान.

चुनाव सर्वेक्षण से जुड़ी देश की एक अन्य प्रतिष्ठित संस्था एडीआर के संस्थापक सदस्य जगदीप छोकर कहते हैं, विधानसभा चुनाव के परिणामों को नकारा नहीं जा सकता है. इस सवाल पर कि क्या विधानसभा चुनाव के नतीजों को ट्रेंड कहा जा सकता है, छोकर ने कहा- अगर तीन तथ्य एक  दिशा में जाते हैं

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