महोबा का लट्ठमार ‘दीवारी’ नृत्य

महोबा (प्रमोद सिंह)

बरसाने की लट्ठमार होली तो आपने देखी और सुनी होगी…लेकिन लट्ठमार दीवारी नृत्य के बारे में आपमें से बहुत कम लोग जानते होंगे। आप भले ही इसके बारे में नहीं जानते होंगे…लेकिन बुंदेलखंड इलाके में लट्ठमार दिवारी नाच काफी मशहूर है। ढोलक की थाप पर थिरकते जिस्म के साथ लाठियों का अचूक वार…युद्ध कला को दर्शाने वाले इस नाच को देखकर लोग दांतों तले अंगुलियां दबाने पर मजबूर हो जाते हैं। दिवारी नृत्य करते युवाओं के पैंतरे देखकर ऐसा लगता है मानो वो दीपावली मनाने नहीं, बल्कि युद्ध का मैदान जीतने निकले हो।

बुंदेलखंड के जनपद महोबा, हमीरपुर, जालौन और बांदा में ये परंपरागत नृत्य बहुत मशहूर है। हाथों में लाठियां, रंगीन निकर के ऊपर कमर में फूलों की झालर…पैरों में घुंघरू बांधे…जोश से भरे नौजवान बुंदेलखंडी नृत्य दिवारी खेलते हुए परंपरागत ढंग से दीपोत्सव मनाते हैं। इस नृत्य में लट्ठ कला का बेहतरीन नमूना पेश किया जाता है। वीर रस से भरे इस नाच को देखकर लोगों का खून उबाल मारने लगता है और जोश मे भरकर बच्चे से लेकर बड़े-बूढ़े सभी के पैर थिरकने लगते हैं। कहा जाता है कि भगवान कृष्ण ने जब कंस का वध किया था…तो उसी उत्साह में दिवारी नृत्य खेली गई थी…ये परंपरा आज भी जारी है। बुंदेलखंड के इलाकों में दीवारी नृत्य टोलियों में होता है। अपने-अपने गांवों की टोलियां बनाकर सभी वर्गों के लोग आत्मरक्षा वाली इस कला का प्रदर्शन करते है। आपस में लाठियां भांजकर एक दूसरे को मारते और बचाव करते हैं।

लाल, हरी, नीली, पीली वेश भूषा और मजबूत लाठी जब दीवारी लोकनृत्य खेलने वालों के हाथ आती है…तब यह बुंदेली सभ्यता-परंपरा को जबर्दस्त तरीके से लोगों के सामने पेश करती है।

बुंदेलखंड का दिवारी लोकनृत्य गोवर्धन पर्वत से भी संबंध रखता है…द्वापर युग में श्री कृष्ण ने जब गोवर्धन पर्वत को अपनी अंगुली पर उठाकर ब्रज वासियों को इंद्र के प्रकोप से बचाया था…तब ब्रजवासियों ने खुश होकर यह दिवारी नृत्य कर श्री कृष्ण की इंद्र पर विजय का जश्न मनाया और ब्रज के ग्वालों ने इसे दुश्मनों को मात देने की सबसे अच्छी कला माना। इसी कारण इंद्र को भी श्रीकृष्ण की लीला को देखकर हार माननी पड़ी। बुंदेलखंड में धनतेरस से लेकर भैया दूज तक गांव गांव में दिवारी नृत्य खेलते हुए नौजवानों की टोलियां घूमती हुई दिख जाएंगी। दिवारी देखने के लिए हज़ारों की भीड़ जुटती है।

बुंदेलखंड वीरों की धरती है…लिहाजा वीर आल्हा उदल की धरती पर मनाए जाने वाले तीज-त्यौहार और पर्व भी वीरता से लबरेज होते हैं। तभी तो रोशनी के पर्व में भी लाठी-डंडों से युद्ध कला को दर्शाते हुए दीपोत्सव मनाने की यह अनूठी परम्परा केवल इसी इलाके की दीपावली में देखने को मिलती है। ख़ास बात यह है कि दीवारी नृत्य में केवल हिंदू ही नहीं…बल्कि मुस्लिम भी बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते हैं।

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