पल भर को आके वो मेरी हस्ती बदल गया!

पल भर को आके वो मेरी हस्ती बदल गया!
पत्थर था मैं तो, मोम के सांचे मे ढल गया!!

नज़़रें, नज़र से उनकी जो टकराई यकबयक!
दम भर को, ये लगा, के मेरा दम निकल गया!!

बरसों की सोची बात निगाहों में खेा गयी!
मुद्दत की ख्वाहिशात केा लमहा निगल गया!!

बोतल से पीके लोग बहकते हैं ख्वामखााह!
मै तो नज़र से पीके भी अक्सर सम्भल गया!!

सामान ज़िन्दगी का मयस्सर ना था मगर !
बच्चा था वो गरीब का सडको पे पल गया!!

अपनों का काम है के हों, अपनों के पासबां!
हैरत के मेरा दिल, मेरी नज़रो के बल गया!

‘साबिर‘ तसव्वुरात में हैं वो मेरे साथ-साथ!
मै फुरकतों के खौफ से आगे निकल गया!!
परिच1472954_251502755014800_1028056022_n[1]य :
नाम : साबिर अली ‘धानवी’
परिचय : साबिर अली यूपी के सहारनपुंर जिले के घाना खंडी के रहने वाले है। सन् 1969 में जन्मे साबिर अली पेषे से अध्यापक है। साबिर अली ने सन् 1990 से लेखन की दुनिया में कदम रखा। बिसरी यादें के नाम से धानवी साहब की किताब भी प्रकाषित हो चुकी है। उपरोक्त अंष उसकी किताब से     लिया गया है।

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