निर्भया कांड: सुप्रीम कोर्ट ने बरकरार रखी फांसी की सजा, सुप्रीम कोर्ट ने ठुकराई याचिका

सुप्रीम कोर्ट ने जज लोया की मौत के मामले में पुनर्विचार याचिका पर फैसला सुरक्षित रखा है. याचिका में वकील इंदिरा जयसिंह ने सुप्रीम कोर्ट की तीखी टिप्पणियों को हटाने की मांग की है. वहीं महाराष्ट्र सरकार ने इसका विरोध करते हुए कहा कि ऐसा कर याचिकाकर्ता विवाद को फिर से खड़ा करना चाहते हैं.

आपको बता दें कि जज लोया की साल 2014 में हुई मौत की  एसआईटी जांच की मांग को लेकर सुप्रीम कोर्ट में पुनर्विचार याचिका दायर की गई है. 19 अप्रैल को दिए गए  फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कुछ सख्त टिप्पणियों के साथ एसआईटी  जांच की मांग को खारिज कर दिया था. याचिका में कोर्ट से 19 अप्रैल के देश में की गई उन सख्त टिप्पणियों को हटाने की मांग भी की गई है, जिसमें कोर्ट ने याचिकाकर्ता की मंशा पर सवाल उठाते हुए इसे न्यायपालिका की आज़ादी और संस्थानों की गरिमा पर हमला  बताया था. याचिका में कहा गया है कि सुप्रीम कोर्ट का फैसला न्याय का गर्भपात साबित हुआ है.

निचली अदालत, हाई कोर्ट और फिर सुप्रीम कोर्ट ने निर्भया के चारों बलात्कारी और हत्यारें को फाँसी की सजा सुनाई थी. विनय, मुकेश और पवन की ओर से वकीलों ने दलील दी थी कि दोषियों की पृष्ठभूमि और सामाजिक व आर्थिक हालात को देखते हुए उनकी सजा कम की जाए और कहा कि 115 देशों ने मौत की सजा को खत्म कर दिया है. सभ्य समाज में इसका कोई स्थान नहीं. सजा-ए-मौत सिर्फ अपराधी को खत्म करती है, अपराध को नहीं. मौत की सजा जीने के अधिकार को छीन लेती है. यह मामला दुर्लभतम से दुर्लभ अपराध की श्रेणी में नहीं आता.

आरोपियों में से एक राम सिंह ने तिहाड़ जेल में कथित तौर पर आत्महत्या कर ली थी. आरोपियों में एक किशोर भी शामिल था. उसे किशोर न्याय बोर्ड ने दोषी ठहराया. उसे तीन साल सुधार गृह में रखे जाने के बाद रिहा कर दिया गया.

वहीं निर्भया की मां ने कहा कि हमारा संघर्ष का यह अंत नहीं है। न्याय में देरी होने से समाज की दूसरी बेटियां भी प्रभावित हो रही हैं। मैं न्यायपालिका से अनुरोध करती हूं कि वह न्याय व्यवस्था को दुरूस्त करें और दोषियों को जल्द से जल्द फांसी देकर निर्भया और समाज की दूसरी बेटियों और महिलाओं को न्याय दें।

उन्होंने कहा कि वह नाबालिग नहीं थे। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि उन्होंने ऐसे पाप किया। इस फैसले से न्यायपालिका पर हमारा विश्वास बढ़ा है कि हमें देर से ही सही पर न्याय जरूर मिलेगा।

जज के मुश्किल वक़्त में भी एसोसिएशन उनके साथ खड़ी है और अगर SIT जांच के बाद मौत की वजह हार्ट-अटैक साबित हो जाती, तो सारी शंकाओं पर विराम लग जाता.

पुनर्विचार याचिका में कहा गया है कि एसोसिएशन ने सिर्फ महाराष्ट्र के इंटेलिजेंस कमिश्नर की रिपोर्ट की सत्यता पर सवाल  उठाये हैं, न कि उन जजों की विश्वसनीयता पर जिन्होंने बयान दर्ज कराए थे. अगर कोर्ट के दिये गए फैसले में की गई प्रतिकूल टिप्पणी कायम रहती है तो न्यायपालिका जैसे संस्थान की रक्षा आने वाले लोगों को हतोत्साहित करेगा. बता दें कि जज लोया अपनी मौत से पहले सोहराबुद्दीन शेख़ मुठभेड़ केस की सुनवाई कर रहे थे. जिसमें भाजपा के मौजूदा अध्यक्ष अमित शाह अभियुक्त थे. लोया के बाद आने वाले सीबीआई जज ने अमित शाह को बरी कर दिया था.

सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद निर्भया के वकील रोहन महाजन ने कहा कि यह विजय के पल हैं। इस फैसले से न्यायपालिका में दोबारा सबका विश्वास कायम हुआ है। हम आज संतुष्ट हैं। अब हमारी केंद्र सरकार से सिर्फ ये विनती है कि जो भी कार्रवाई बाकी है उसे तुरंत निपटाया जाए और दोषियों को फांसी दी जाए।

 

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