सरकारी अस्पताल में नही मिला शव वाहन, मासूम का शव कंधे पर लेकर गया पिता….

यूपी में स्वास्थ्य सुविधाओं की बदहाली की खबरें हर दिन सुर्खियां बन रही हैं…ताजा मामला कानपुर से आया है…वो भी यहां के सबसे बड़े सरकारी अस्पताल से…यहां सरकारी निर्देशों की खुलकर धज्जियां उड़ाई जा रही हैं। यहां जीते-जी तो मरीजों को इलाज की सुविधाएं नहीं मिल पाती हैं…मरने के बाद भी उन्हें चैन मयस्सर नहीं हो पाता है। मरने के बाद मरीजों के परिजनों को शव ले जाने के लिए शव वाहन तक नहीं मिल पाता है। इस मामले में चार साल की मासूम बच्ची के शव को कंधे पर लेकर उसके परिजन दो घंटे तक भटकते रहे…अधिकारियों और कर्मचारियों से शव वाहन दिए जाने की गुहार लगाई। लेकिन उन्हें शव वाहन नहीं मिला और आखिर में उन्हें  टेंपो से शव लेकर जाना पड़ा। दरअसल उन्नाव में कचहरी के पास रहने वाले शानू की चार साल की बेटी सेजल छह जुलाई को छत से गिरकर घायल हो गई ती। उन्नाव के जिला अस्पताल से बच्ची को हैलट रेफर कर दिया गया। शाम को हैलट इमरजेंसी में न्यूरो सर्जन डॉ. मनीष सिंह की यूनिट में भर्ती कराया गया। सेजल के मामा शीलू ने बताया कि रविवार सुबह करीब पौने नौ बजे बच्ची की मौत हो गई। आर्थिक स्थिति ठीक न होने के कारण उन्होंने नर्स से शव वाहन उपलब्ध कराने की गुहार लगाई। उनके कहने पर वह भांजी के शव को कंधे पर लेकर इमरजेंसी गया। परिजदनों ने आकस्मिक चिकित्साधिकारी डॉ. मयंक से शव वाहन उपलब्ध कराने की गुहार लगाई, पर उन्होंने अस्पताल में शव वाहन न होने का हवाला देकर टरका दिया। ओपीडी के बाहर खड़े कर्मचारियों से भी गुहार लगाई लेकिन वाहन नहीं मिला। बता दें कि उर्सला अस्पताल में दो शव वाहन हैं लेकिन शहर के सबसे बड़े सरकारी अस्पताल हैलट में एक भी शव वाहन नहीं है।

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