आरबीआई के पास नहीं अधिकार!

भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के गवर्नर ऊर्जित पटेल ने सरकार को खरी-खरी सुनाते हुए आज कहा कि पंजाब नैशनल बैंक (पीएनबी) में हाल में हुआ घोटाला केंद्रीय बैंक के अधिकार कम करने का नतीजा है। उन्होंने कहा कि सार्वजनिक बैंकों के नियमन के जो अधिकार आरबीआई के पास थे, उन्हें कम करने के सरकार के प्रयासों का नतीजा इस घोटाले के रूप में सामने आया है।

 

पटेल ने इशारा किया कि आरबीआई वास्तव में असहाय है और उसके पास न तो सरकारी बैंकों के निदेशक मंडल को हटाने या उसे विलय के लिए विवश करने का अधिकार है और न ही वह किसी बैंक का लाइसेंस रद्द कर सकता है। उन्होंने कहा कि सरकार ने बैंकिंग नियमन अधिनियम में जो संशोधन किए हैं, उनकी वजह से केंद्रीय बैंक के सभी अधिकार सरकार के हाथ में पहुंच गए हैं। पटेल ने मांग की कि वक्त की नजाकत देखते हुए बैंकिंग नियमन को तटस्थ बनाया जाना चाहिए। 120 अरब रुपये से अधिक का जो फर्जीवाड़ा हुआ है, उसने सरकार को सार्वजनिक बैंकों में बुनियादी सुधार करने का मौका दिया है और इसे गंवाना नहीं चाहिए। 

पटेल के अनुसार बैंकिंग नियमन अधिनियम में संशोधन से आरबीआई के अधिकार को स्पष्ट तौर पर सीमित कर दिए गए हैं और सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के कारोबारी प्रशासन में आरबीआई के अधिकार को पूरी तरह से खत्म कर दिया गया है या उसे कम कर दिया गया है। पटेल ने कहा, 'वास्तविकता यह है कि बैंकिंग नियमन की व्यवस्था में चौड़ी खाई बन गई है और इसका दोहरा नियमन हो रहा है – आरबीआई के अलावा वित्त मंत्रालय भी नियमन कर रहा है।'

उन्होंने कहा कि बैंकिंग नियमन कानून से सार्वजनिक बैंकों को छूट देने का मतलब है कि नियामक के तौर जो संस्था बैंकिंग धोखाधड़ी या अनियमितता पर अपेक्षाकृत त्वरित निर्णय ले सकती है, वह उन बैंकों पर ठोस कार्रवाई नहीं कर सकती है। पटेल ने कहा कि बैंकिंग नियामक के पास सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों की तुलना में निजी क्षेत्र के बैंकों से संबंधित अधिकार ज्यादा हैं। उन्होंने कहा कि सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के लिए भी प्रतिस्पर्धी निजी बैंकों की तरह एकसमान नियमन की व्यवस्था होनी चाहिए और इसके लिए आरबीआई के पास प्रभावी और निर्णायक अधिकार होने चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक प्रमुख इस बात को जानते हैं कि आरबीआई के पास कोई विशेष अधिकार नहीं है और वे नियामक के समक्ष केवल हां में हां मिलाते हैं।

 

निजी क्षेत्र के बैंकों को बाजार का डर है क्योंकि कोई गड़बड़ी हुई तो उन्हें बाजार से रकम जुटाने में दिककत होगी। लेकिन सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के साथ ऐसी बात नहीं है।पटेल ने कहा कि यह मुद्दा साफ है कि क्या सरकारी बैंकों के कामकाज का डिजाइन बनाने और उसे लागू करने में केवल केंद्र सरकार की भूमिका ही पर्याप्त है। इन बैंकों के पास बैंकिंग क्षेत्र का दो तिमाही जमा राशि और संपत्तियां हैं। इसके बजाय यह बेहतर होगा कि नियामकीय और बाजार अनुशासन को बहाल किया जाए। 

 

उन्होंने साथ ही किसी बैंक के लिए अलग-अलग अध्यक्ष और प्रबंध निदेशक नियुक्त करने की व्यवस्था को भी आड़े हाथ लेते हुए कहा कि वे एक ही हैं और इसका अर्थ है कि प्रबंध निदेशक केवल अपने प्रति ही जवाबदेह होता है। पटेल ने कहा कि केंद्रीय बैंक इस मामले में संबंधित बैंक (पीएनबी) के खिलाफ कार्रवाई करेगा। लेकिन उस पर कितना जुर्माना किया जाएगा यह पहले ही बीआर कानून द्वारा तय किया गया है। पहले आरबीआई ने जब भी किसी बैंक पर जुर्माना लगाया है तो यह 5 करोड़ रुपये से ज्यादा नहीं है जो असल में किसी बैंक के लिए कुछ भी नहीं है।

पीएनबी धोखाधड़ी मामले में केंद्रीय बैंक की भूमिका का बचाव करते हुए पटेल ने कहा कि कोई भी बैंक नियामक सभी घोटालों को नहीं पकड़ सकता है और यह अपनी व्यवस्थाओं की जांच करना बैंक की जिम्मेदारी है। उन्होंने कहा कि आरबीआई ने बैंकों को कम से कम 3 बार चेतावनी देकर अपने स्विफ्ट नेटवर्क को दुरुस्त करने को कहा था। धोखाधड़ी सामने आने के बाद यह बात उजागर हुई है कि बैंक ने ऐसा नहीं किया। साफ है कि बैंक की आंतरिक व्यवस्था इस धोखाधड़ी को पकड़ने में नाकाम रही जबकि इसे बंद करने के स्पष्ट निर्देश दिए गए थे। 

पटेल ने कहा कि आरबीआई को बैंकों पर यह दबाव डालने के लिए मजबूर किया गया कि वे अपने फंसे कर्ज का खुलासा करें और समयबद्ध तरीके से फंसे कर्ज के समाधान के लिए नियामकीय ढांचा अपनाएं। केंद्रीय बैंक को समाधान प्रक्रिया को आसान बनाने के लिए पुनर्गठन के कई कानूनों को खत्म करना पड़ा। दिवालिया कानून और आरबीआई के संशोधित ढांचे से प्रवर्तकों और बैंकों की साठगांठ को तोडऩे में मदद मिलेगी। उन्होंने कहा, 'मैंने आज अपनी बात रखने का फैसला इसलिए किया क्योंकि हम बताना चाहते थे कि बैंकिंग क्षेत्र में धोखाधड़ी और अनियमितताओं से हमारे मन में भी गुस्सा है। कुछ कंपनियां और बैंक मिलकर इस देश के भविष्य को लूट रहे हैं।' उन्होंने कहा कि आरबीआई इस साठगांठ को तोडने के लिए हरसंभव प्रयास कर रहा है। 

 

पटेल ने आरबीआई की कार्रवाई को आधुनिक भारतीय अर्थव्यवस्था का समुद्र मंथन बताते हुए कहा कि जब तक मंथन पूरा नहीं हो जाता है और देश के भविष्य के लिए स्थिरता का अमृत नहीं निकल जाता है, तब तक किसी को विष पीना पड़ेगा। अगर हमें यह विष पीकर नीलकंठ बनना पड़े तो हम अपने कर्तव्य को निभाने के लिए ऐसा करेंगे।

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