स्मृति शेष: दिलेर संपादक थे श्याम जी और मुझे उनका ‘चमचा’ कहा जाता था !

श्याम जी के कठोर प्रशासन ने पूरे भास्कर परिवार को आतंकित कर रखा था… किंतु अखबार में अप्रत्याशित सुधार हो रहा था। श्याम जी के साथ चल पाने में असमर्थ लोगों ने उनके खिलाफ मोर्चा खोला और सेठ जी के कान भरना शुरू कर दिया। सेठ जी थे भी कान के कच्चे… वे हकीकत समझ नहीं पाए और उन्होंने श्याम जी के बारे में फैसला कर लिया। एक शाम जब श्याम जी महाराज बाड़ा पर एक जनवादी मंच पर मुख्य अतिथि के रूप में आसीन थे तो उसी वक्त सेठ जी ने मुझसे श्याम जी के बारे में पूछा। मैंने उन्हें बताया कि वे एक घंटे बाद दफ्तर आएंगे। सेठ जी बोले, ’’नहीं… उन्हें तत्काल बुलाओ।’’

 

लेखकः राकेश (वरिष्ठ पत्रकार)

बात उन दिनों की है जब मैं ग्वालियर के दैनिक भास्कर संस्करण में सिटी रिपोर्टर था…शायद ये साल 1986-87 की बात हो! श्याम जी को ग्वालियर संस्करण का संपादक बनाकर भेजा गया। अखबार के दफ्तर के पास ही एक होटल में उनका डेरा था। श्याम जी ने आते ही ग्वालियर संस्करण की वर्षों पुरानी व्यवस्थाओं को उलट-पलट कर रख दिया। फलस्वरूप अनेक महारथियों का साम्राज्य डगमगाने लगा।


श्याम जी ने मेरे ऊपर सिटी डेस्क के सभी रिपोटर्स की कॉपी जांचने का दायित्व रख दिया। मैं धर्म संकट में था कि अपने से वरिष्ठ लोगों की कॉपी मैं कैसे जांचूंगा? लेकिन श्याम जी टस-मस नहीं हुए। उन दिनों अखबार पुराने तौर-तरिके से चलता था। यानि अखबार के माइलक सेठ द्वारका प्रसाद अग्रवाल सेठों की ही तरह अखबार के दफ्तर में बैठते थे और अखबार में उनकी मर्जी के बिना पत्ता तक नहीं हिलता था, किंतु श्याम जी ने तो अखबार का पूरा दरख्त ही हिला दिया था। 


सेठ जी अनेक विश्वास पात्र साथी श्याम जी के राडार पर आ गए थे और आलम ये कि सेठ जी भी उनकी कोई मदद नहीं कर पा रहे थे। शायद उनके मन में अखबार को बेहतर बनाने का कोई सपना रहा होगा। ये सिलसिला कोई चार माह तक चला। श्याम जी अपने संपादन के अलावा शहर की सामाजिक गतिविधियों में भी रच-बस गए थे। हर मंच पर श्याम जी की मांग थी। वे अपनी विचारधारा को लेकर स्पष्ट थे। मुझे उनका ’चमचा’ माना जाने लगा था… लेकिन हकीकत ये थी कि वे मुझे विचार साम्य के कारण पसंद करते थे। 


श्याम जी के कठोर प्रशासन ने पूरे भास्कर परिवार को आतंकित कर रखा था… किंतु अखबार में अप्रत्याशित सुधार हो रहा था। श्याम जी के साथ चल पाने में असमर्थ लोगों ने उनके खिलाफ मोर्चा खोला और सेठ जी के कान भरना शुरू कर दिया। सेठ जी थे भी कान के कच्चे… वे हकीकत समझ नहीं पाए और उन्होंने श्याम जी के बारे में फैसला कर लिया। एक शाम जब श्याम जी महाराज बाड़ा पर एक जनवादी मंच पर मुख्य अतिथि के रूप में आसीन थे तो उसी वक्त सेठ जी ने मुझसे श्याम जी के बारे में पूछा। मैंने उन्हें बताया कि वे एक घंटे बाद दफ्तर आएंगे। सेठ जी बोले, ’’नहीं… उन्हें तत्काल बुलाओ।’’


सेठ का हुक्म सर-आँखों पर रखना होता था। मैंने इधर श्याम जी को संदेश भेजा, उधर डाफ्ट्र में एक आपात बैठक बुलाई गई। सब हैरान थे। नाश्ता और फूल मालाएं भी आ गईं… श्याम जी भी आ गए। सेठ जी ने बोलना शुरू किया और श्याम जी की तारीफों के पुल बांध दिए… लेकिन अंत में सबको चौंकाते हुए कहा कि ’’आज से श्याम जी का दैनिक भास्कर से नाता समाप्त हो रहा है। इसलिए हम सब उनके उज्जवल भविष्य की कामना करते हुए उन्हें विदाई दे रहे हैं।’’ मुझे काटो तो खून नहीं… लेकिन श्याम जी मंद-मंद मुस्कराते रहे। उन्होंने अपना उद्बोधन ऐसे दिया जैसे कुछ हुआ ही न हो। श्याम जी के विरोधी खुश थे और मेरी आंखें नम थीं। श्याम जी विदाई पार्टी समाप्त होते ही दफ्तर से अपने होटल गए। उन्होंने मुझे भी बुलाया और कहा ’’देखो राकेश ! ये तो होना ही था… होता ही है! तुम भी यहां ज्यादा दिन शायद न ठहर पाओ, लेकिन इतना याद रखना कि नौकरी के लिए कभी अपने उसूलों से समझौता मत करना।’’ श्याम जी की बात मैंने ताउम्र गांठ बांध कर रखी। पिछले दिनों मैं रुग्णावस्था में उनसे मिलने दिल्ली गया था… लेकिन उनकी दशा नाजुक थी… सो दर्शन न कर पाया। अब वे हमेशा यादों का अभिन्न हिस्सा बन कर साथ रहेंगे। उन जैसे अक्खड़ संपादक अब शायद पैदा ही नहीं होते। मेरी विनम्र श्रृद्धांजलि ।।

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