हॉलीवुड फिल्मों के बीच पहचान बनाती भारतीय बाल फिल्में

(प्रेमबाबू शर्मा)

‘‘बर्लिन फिल्म फेस्टिवल’ हुआ। यू तो यह फेटिवल हालीवुड फिल्मों के नाम रहा।लेकिन इसकी एक सबसे बडी खसियत यह रहीं कि फेस्टिवल का एक एक कोना बाल मन के भावों संवेदनाओं को उकेरने वाली फिल्मों के नाम रहा । और सबसे अच्छी बात रही कि इस फेस्टिवल में भारत का प्रतिनिधित्व करने वाली दोनों ही फिल्में बाल प्रधान रहीं। जिन्हें ना केवल दर्शकों ने खूब सराहा बल्कि समीक्षकों को भी खूब पंसद आयीं। ‘‘सैरात’ और ‘‘ओट्टल’ फिल्मों की दिल को छूने वाली बाल कहानी विदेशी जमीं पर हुए फिल्मोंत्सव में खूब तालियां बटोर ले गई। हालांकि भारत में बाल फिल्मों का आज भी किसी श्रेणी में नही रखा जाता।लेकिन उम्मीद है कि सौ करोड़ वाली फेम बालीवुड संसार इस सराहना से प्रेरित होकर बच्चों के लिए ना केवल ना केवल मनोरंजन और अच्छे विषये और उद्देश्यपरक फिल्म बनाने में ध्यान देगा।

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भारतीय फिल्में समय-समय पर विदेशी धरती पर सजने वाले फिल्मों के मेले में अपने कय और शैली से समां बांधती आई हैं। हालांकि, ऐसी कम फिल्में हैं, जिन्हें विदेशी धरती पर आयोजित होने वाले प्रतिष्ठित फिल्म फेस्टिवल में शामिल होने का मौका मिलता है। ऐसे में, जो चुनिंदा फिल्में भारत से इन फिल्म फेस्टिवल के लिए चुनी जाती हैं, वह स्वयं में विशिष्ट बन जाती हैं। इस वर्ष लोकप्रिय और प्रतिष्ठित ‘‘बर्लिन फिल्म फेस्टिवल’ में शामिल हुई दो फिल्में ‘‘सैरात’ और ‘‘ओट्टल’ ऐसी ही दो विशिष्ट फिल्में हैं। रोचक तय है कि ये दोनों ही फिल्में बाल प्रधान फिल्में हैं।

गौरतलब है कि ‘‘बर्लिन फिल्म फेस्टिवल’ भारत में बनी बाल फिल्मों की ओर ज्यादा मुखातिब है। यह सिलसिला 2012 से शुरू हुआ जब बर्लिन फिल्म फेस्टिवल की जूरी द्वारा राजन खोसा निर्मिंत ‘‘गट्टू’ का विशेष उल्लेख किया गया। नंदिता दास के मार्गदर्शन में और चिल्ड्रन फिल्म्स सोसायटी के तत्वावधान में बनी ‘‘गट्टू’ में पतंगबाजी के शौकीन बच्चे के मनोभावों को पिरोया गया था। ‘‘गट्टू’ के बाद 2014 में मराठी फिल्म ‘‘किल्ला’ और 2015 में नागेश कुकनूर निर्मिंत ‘‘धनक’ को भी बर्लिन फिल्म फेस्टिवल में विशेष सम्मान मिला। इन सभी फिल्मों में मुख्य किरदार बाल कलाकारों ने निभाए थे।

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‘‘किल्ला’ में पिता की मृत्यु के बाद मां की परेशानियों को देखते-सुनते बालक की दिल छूने वाली कहानी कही गयी थी। इस फिल्म को 2014 में बर्लिन फिल्म फेस्टिवल में जनरेशन के प्लस श्रेणी में क्रिस्टल बेयर से सम्मानित किया गया। ‘‘धनक’ (जो अब तक भारतीय सिनेमाघरों में प्रदर्शन का इंतजार कर रही है) ने पिछले वर्ष बर्लिन फिल्म फेस्टिवल में दो सम्मान हासिल किये।

एक जनरल के प्लस इंटरनेशनल जूरी का ग्रैंड पिक्स सम्मान है और दूसरा चिल्ड्रन जूरी द्वारा विशेष सम्मान। ‘‘धनक’ एक अंधे बालक और उसकी बहन की कहानी है जो शाहरुख खान से मिलने के लिए राजस्थान के रेत की खाक छानते हैं।

इस वर्ष भी बाल कलाकारों से सजी दो फिल्में ‘‘सैरात’ और ‘‘ओट्टल’ बर्लिन फिल्म फेस्टिवल में भारत का प्रतिनिधित्व किया।

नागराज मंजुल निर्मिंत ‘‘सैरात’ मराठी फिल्म है जिसे इस प्रतिष्ठित फिल्म फेस्टिवल में ‘‘फोर्टीन प्लस’ श्रेणी में शामिल किया गया है। फिल्म में भारत में जाति और वर्ग के समीकरण को गरीब किशोर युवक और ऊंची जाति की किशोरी के प्रेम संबंध की पृष्ठभूमि में दर्शाने का प्रयास किया गया है। जहां ‘‘सैरात’ को किशोर दर्शकों के लिए चुना गया, वहीं जयराज निर्मिंत ‘‘ओट्टल’ का चुनाव फेस्टिवल में आने वाले चार वर्ष और उससे अधिक उम्र के दर्शकों के लिए किया गया। कहानी ‘‘वंका’ पर आधारित मलयालम फिल्म ‘‘ओट्टल’ में बाल-संवेदनाओं को दर्शाने की कोशिश की गयी है। फिल्म में पोल्ट्री फार्म में काम करने वाले आठ वर्षीय बालक का उसके दादा और प्राकृति के साथ आत्मिक संबंध का चितण्रकिया गया है। उम्मीद है, बर्लिन फिल्म फेस्टिवल में बाल मनोभावों को दर्शाती भारतीय फिल्मों को मिल रही सराहना से हिंदी फिल्मों के निर्माता-निर्देशक भी प्रेरित होंगे और समय-समय पर ‘‘स्टेनली का डब्बा’ और ‘‘चिल्लर पार्टी’ जैसी बाल प्रधान फिल्मों का निर्माण कर दर्शकों के सामने कुछ नयी, प्रयोगशील, बेहतर और बाल-सुलभ मनोरंजक सामग्री पेश करेंगे।

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