लहू ये रंग लायेगा लहू

लहू ये रंग लायेगा लहू, ये रंग लायेगा।
ये बेकसों का खून है ये रायगां ना जायेगा!

ये दुआँए दर्द की जब आसमां पे जायेंगी!
है मुझे यकीन ये, के ये असर भी लायेंगी!
हुकाँर बनके आयेगी आवाज मौत की!
फिर मौत को बतायेंगें औकात मौत की!

सूली पे चढके फिर भी ये मंसूर गाये गा!
लहू ये रंग लायेगा लहू, ये रंग लायेगा।

मुद्दत से मुन्जमिद हो उठो अब तो चल पडो!
परचम कोई भी हाथ में लेकर निकल पडो !

सीनों से अपने मौत की दहशत निकाल दो!
तुम खुद रगों का खून फिजा मे उछाल दो!
सरें से बाँध लो कफन के इन्कलाब आयेगा!
लहू ये रंग लायेगा लहू, ये रंग लायेगा।

उठो भी अब जवानियों सितम की इस ज़मीन से!
ज़बीं का खून पूँछ कर खुद अपनी आस्तीन से!

कलाइंया मरोड दो सितमगरो की शान से!
सदाये मरहबा उठे जमीं से आसमान से !
सितम हदों से बढ गया अब इन्कलाब आयेगा !
लहू ये रंग लायेगा लहू, ये रंग लायेगा।
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परिचय :
नाम : साबिर अली ‘धानवी’
परिचय : साबिर अली यूपी के सहारनपुंर जिले के घाना खंडी के रहने वाले है। सन् 1969 में जन्मे साबिर अली पेषे से अध्यापक है। साबिर अली ने सन् 1990 से लेखन की दुनिया में कदम रखा। बिसरी यादें के नाम से धानवी साहब की किताब भी प्रकाषित हो चुकी है। उपरोक्त अंष उसकी किताब से     लिया गया है।

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