दिल्ली सरकार से पहले कहां-कहां हुए हैं संसदीय सचिवों की नियुक्ति को लेकर विवाद,

दिल्ली की केजरीवाल सरकार को एक बड़ा झटका लगा है। राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने दिल्ली सरकार के उस बिल को मंज़ूरी देने से मना कर दिया है, जिसमें AAP के 21 विधायकों के संसदीय सचिव के पद को लाभ के पद से अलग करने का प्रस्ताव था। गृहमंत्रालय के सूत्रों ने  बताया कि बिल पर राष्ट्रपति के दस्तख़त से इनकार के बाद आम आदमी पार्टी के 21 विधायकों की सदस्यता पर सवाल खड़े हो गए हैं, ऐसे में सभी विधायकों की सदस्यता रद्द हो जाएगी, जिसके बाद इन 21 सीटों पर दोबारा चुनाव कराया जा सकता है।

केजरीवाल सरकार पहली नहीं है, जिसने संसदीय सचिव के पद को ऑफिस ऑफ प्रॉफिट की परिभाषा से बाहर करने के लिए कानून में संशोधन करने की कोशिश की हो। इससे पहले कई सरकारों ने इस तरह के कदम उठाये हैं। सबसे ताज़ा मिसाल मणिपुर और पश्चिम बंगाल का है।

दोनों ही सरकारों ने 2012 में अपने अपने कानूनों में संशोधन कर संसदीय सचिव के पद को ऑफिस ऑफ प्रॉफिट से बाहर करने की कोशिश की और दोनों ही सरकारों के इस कदम को अदालत में चुनौती दी गई जहां मणिपुर के कानून को अदालत ने सही ठहराया वहीं पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी सरकार को हाईइकोर्ट ने रद्द कर दिया।

केजरीवाल ने अपने संसदीय सचिवों को बचाने के लिये कानून में जो संशोधन किया उसे केंद्र सरकार ने ही मंजूरी नहीं दी। अब आम आदमी पार्टी केंद्र पर निशाना साध कर दूसरे राज्यों की मिसाल दे रही है। सीएम अरविंद केजरीवाल का कहना है कि तमाम राज्यों में संसदीय सचिव हैं तो हमें क्यों निशाना बनाया जा रहा है।

पंजाब सरकार की वेबसाइट बताती है कि वहां 19 संसदीय सचिव हैं। इसे अदालत में चुनौती दी गई है। हरियाणा में भी 4 संसदीय सचिव हैं। इसे भी अदालत में चुनौती दी गई है, हालांकि इन राज्यों में इन पदों को सही ठहराने के लिये कानूनी प्रावधान भी है जिसके सही गलत होने का फैसला अदालत में होगा। उधर, पुदुच्चेरी में संसदीय सचिव का एक पद है, लेकिन पुदुच्चेरी का संसदीय सचिव कानून हो जो इस पद को जायज ठहराता है।

उधर 2006 में जया बच्चन के मामले में दिया गया सुप्रीम कोर्ट का ये फैसला कहता है कि अगर किसी सांसद या विधायक ने ऑफिस ऑफ प्रॉफिट का पद लिया है तो उसे सदस्यता गंवानी होगी चाहे वेतन या भत्ता लिया हो या नहीं। चुनाव आयोग के पूर्व सलाहकार के जे राव कहते हैं कि आप के विधायकों पर आखिरी फैसले का ऐलान चुनाव आयोग ही करेगा।

-शीला सरकार तक 3 से ज़्यादा संसदीय सचिव नहीं रहे
-साहेब सिंह वर्मा ने नंद किशोर गर्ग को संसदीय सचिव बनाया
-अयोग्य करार दिए जाने की आशंका से गर्ग ने इस्तीफ़ा दिया
-1998-2003 के दौरान शीला सरकार में एक संसदीय सचिव
-2003-2008 और 2008-2013 में सिर्फ़ 3 संसदीय सचिव

सोनिया गांधी ने 2006 में विवाद के बाद अपने कई पदों से इस्तीफ़ा दिया
जया बच्चन की राज्यसभा सदस्यता रद्द की गई थी
यूपी के दो विधायकों की सदस्यता गई
2015 में बजरंग बहादुर सिंह, उमाशंकर सिंह की सदस्यता रद्द

पहले भी संसदीय सचिव पर विवाद

पश्चिम बंगाल (टीएमसी सरकार)
दिसंबर 2012 : संसदीय सचिव बिल पास
जनवरी 2013 : 13 विधायकों को संसदीय सचिव बनाया
जनवरी 2014 : 13 और विधायक संसदीय सचिव नियुक्त
संसदीय सचिवों को मंत्री का दर्जा प्राप्त
जून 2015: हाईकोर्ट ने बिल को असंवैधानिक बताया
धारा 164 (1A) के तहत असंवैधानिक ठहराया
धारा 164-(1A): कुल विधायकों के 15% से ज़्यादा मंत्री नहीं हो सकते

गोवा (कांग्रेस सरकार)
2007 : कांग्रेस सरकार ने 3 विधायकों को संसदीय सचिव बनाया
तय संख्या से तीन ज़्यादा मंत्री बनाए गए
विवाद होने पर तीनों को कैबिनेट रैंक के साथ संसदीय सचिव बनाया
जनवरी 2009 : बॉम्बे हाइकोर्ट ने इसे संविधान का उल्लंघन बताया
मंत्रियों की संख्या कम करने के लिए ऐसा नहीं कर सकते : HC

हिमाचल प्रदेश (कांग्रेस सरकार)
2005 : 8 विधायकों को मुख्य संसदीय सचिव, 4 को संसदीय सचिव बनाया
नियुक्ति के लिए सरकार ने कोई व्यवस्था नहीं बनाई
CM के पास संसदीय सचिव नियुक्त करने का अधिकार नहीं: हाइकोर्ट
सभी 12 विधायकों की संसदीय सचिव पद से छुट्टी

दिल्ली में कहां फंसा पेच?
मार्च 2015 : 21 विधायकों की संसदीय सचिव के तौर पर नियुक्ति
जून 2015 : सरकार ने बिल लाकर संसदीय सचिव के पद को लाभ के पद से हटाया
सरकार ने संशोधित क़ानून को बैक डेट से लागू करने का प्रस्ताव किया
दिल्ली सरकार ने बिल को उपराज्यपाल के पास भेजा
उपराज्यपाल ने बिल को केंद्र और राष्ट्रपति के पास भेजा
दिल्ली सरकार के फैसले को केंद्र से मंजूरी नहीं मिली
मार्च में की गई नियुक्तियां गलत नहीं तो जून में संशोधित बिल क्यों?
जून 2016 : राष्ट्रपति ने इस संशोधित बिल को ख़ारिज कर दिया

 

 

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