वाशिंगटन, डी.सी. — वैश्विक स्तर पर बढ़ते तकनीकी प्रभाव और बदलते भू-राजनीतिक समीकरणों के बीच, एक वरिष्ठ अमेरिकी सांसद ने भारत की अंतरिक्ष शक्ति को एक शानदार श्रद्धांजलि दी है। 12 जनवरी, 2026 को सेंटर फॉर स्ट्रेटेजिक एंड इंटरनेशनल स्टडीज (CSIS) में बोलते हुए, कांग्रेस सदस्य रिच मैककॉर्मिक ने भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) की उस क्षमता पर “आश्चर्य” व्यक्त किया, जिसके तहत भारत ने चंद्रमा के दुर्गम क्षेत्रों को उस कीमत पर जीत लिया, जिसमें वाशिंगटन में एक व्यावसायिक इमारत तक नहीं बन सकती।
मैककॉर्मिक ने नीति निर्माताओं की एक सभा को संबोधित करते हुए कहा, “भारत ने 80 मिलियन डॉलर में चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर एक अंतरिक्ष यान उतार दिया। 80 बिलियन डॉलर नहीं, बल्कि केवल 80 मिलियन डॉलर। अमेरिका इस कीमत पर एक इमारत भी नहीं बना सकता।” उनकी यह टिप्पणी भारत-अमेरिका साझेदारी के एक संवेदनशील मोड़ पर आई है, जब दोनों देश “पारस्परिक टैरिफ” और ऊर्जा सुरक्षा से संबंधित तनावों का सामना कर रहे हैं।
मितव्ययी इंजीनियरिंग: चंद्रयान-3 की ऐतिहासिक जीत
चंद्रयान-3 मिशन, जिसकी चर्चा मैककॉर्मिक ने की, “मितव्ययी इंजीनियरिंग” (Frugal Engineering) का एक वैश्विक उदाहरण बना हुआ है। लगभग 615 करोड़ रुपये (करीब 80 मिलियन डॉलर) के बजट के साथ लॉन्च किए गए इस मिशन ने वह हासिल किया जो अमेरिका, रूस या चीन भी नहीं कर पाए थे: चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव के पास एक सफल ‘सॉफ्ट लैंडिंग’।
इस मिशन की सफलता केवल राष्ट्रीय गौरव तक सीमित नहीं थी, बल्कि इसने अंतरिक्ष अन्वेषण के एक टिकाऊ मॉडल का प्रदर्शन किया। जहां नासा के आगामी आर्टेमिस मिशनों में अरबों डॉलर के अनुबंध शामिल हैं, वहीं इसरो की स्वदेशी तकनीक और “स्लिंगशॉट पद्धति”—जिसमें विशाल प्रणोदन प्रणालियों के बजाय पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण का उपयोग किया जाता है—ने 21वीं सदी की अंतरिक्ष दौड़ के अर्थशास्त्र को बदल दिया है।
“प्रधानमंत्री मोदी सकारात्मक रूप से बेहद राष्ट्रवादी हैं। वह अपने देश के हित में काम कर रहे हैं। जब भारत सस्ता रूसी तेल खरीदता है, तो अमेरिका को यह पसंद नहीं आता। लेकिन वह अपने देश के सर्वोत्तम हित में ऐसा कर रहे हैं।” — रिच मैककॉर्मिक, अमेरिकी सांसद
तनावपूर्ण साझेदारी: टैरिफ और चुनौतियां
भारत की अंतरिक्ष उपलब्धियों की प्रशंसा के साथ-साथ, मैककॉर्मिक ने नई दिल्ली की “रणनीतिक स्वायत्तता” का भी बचाव किया। वर्तमान में, भारत-अमेरिका संबंध एक कठिन दौर से गुजर रहे हैं। 2025 के अंत में, ट्रम्प प्रशासन ने भारतीय उत्पादों पर 25% अतिरिक्त टैरिफ लगा दिया था, जिसका मुख्य कारण भारत द्वारा रूस से कच्चे तेल की खरीद जारी रखना था। वाशिंगटन का तर्क है कि ये खरीद मास्को के युद्ध प्रयासों को वित्तपोषित करती है।
हालांकि, भारत अपनी घरेलू ऊर्जा जरूरतों का हवाला देते हुए अपने रुख पर अडिग रहा है। मैककॉर्मिक ने स्वीकार किया कि भले ही अमेरिका को यह पसंद न हो, लेकिन वह पीएम मोदी की अपनी आबादी की रक्षा करने की प्राथमिकता को समझते हैं। उन्होंने मोदी को “गांधी के बाद शायद सबसे लोकप्रिय राजनेता” बताया।
पाकिस्तान से तुलना: निवेश बनाम सहायता
भारतीय-अमेरिकी प्रवासियों के बीच गूंजने वाली एक टिप्पणी में, मैककॉर्मिक ने भारत और पाकिस्तान के बीच एक स्पष्ट रेखा खींची। उन्होंने कहा कि जहां पाकिस्तान अक्सर सहायता या भू-राजनीतिक संरेखण के माध्यम से समर्थन मांगता है, वहीं भारत “निवेश का इंजन” बन गया है।
मैककॉर्मिक ने कहा, “भारत न केवल निवेश लेता है, बल्कि वह संयुक्त राज्य अमेरिका में भी निवेश लाता है।” यह बदलाव भारत के एक सहायता प्राप्त करने वाले देश से अमेरिकी अर्थव्यवस्था के एक महत्वपूर्ण हिस्सेदार बनने के सफर को दर्शाता है।
आगे की राह
यद्यपि व्यापारिक मोर्चे पर मतभेद बने हुए हैं और कुछ सामानों पर 50% तक के टैरिफ लागू हैं, लेकिन सुलह के संकेत भी मिल रहे हैं। विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने हाल ही में अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो के साथ महत्वपूर्ण खनिजों और परमाणु सहयोग पर चर्चा की है। मैककॉर्मिक की टिप्पणियां बताती हैं कि वाशिंगटन का एक हिस्सा भारत को एक “अपरिहार्य भागीदार” के रूप में देखता है, जिसकी कार्यकुशलता—जिसका प्रमाण उसका 80 मिलियन डॉलर का मून मिशन है—ऐसी चीज है जिसे अमेरिका को दंडित करने के बजाय सीखने का प्रयास करना चाहिए।
