जैसे-जैसे भारत सरकार आगामी केंद्रीय बजट का खाका तैयार कर रही है, व्यापार नीति में एक रणनीतिक बदलाव आकार लेता दिख रहा है। लगातार बढ़ते व्यापार घाटे, विशेष रूप से चीन के साथ, का सामना करने के लिए नीति निर्माता एक दोहरी रणनीति पर विचार कर रहे हैं: गैर-आवश्यक वस्तुओं पर सीमा शुल्क बढ़ाना और उन उत्पादों के लिए लक्षित प्रोत्साहन देना जहाँ घरेलू विनिर्माण क्षमता तो है, लेकिन आयात अभी भी अधिक है। इस कदम का उद्देश्य भारत की आपूर्ति श्रृंखलाओं के जोखिम को कम करना और एकल-देश आयात पर अत्यधिक निर्भरता से उत्पन्न संरचनात्मक कमजोरी को दूर करना है।
बढ़ता व्यापार घाटा
इन उपायों की आवश्यकता हाल के व्यापारिक आंकड़ों से स्पष्ट होती है। वित्त वर्ष 26 की अप्रैल-नवंबर अवधि के दौरान, भारत का वस्तु निर्यात 292 बिलियन डॉलर रहा, जबकि आयात बढ़कर 515.2 बिलियन डॉलर तक पहुंच गया। यह अंतर एक बड़ी बाहरी संवेदनशीलता को दर्शाता है। चीन के साथ द्विपक्षीय व्यापार में यह अंतर सबसे अधिक है। इसी आठ महीने की अवधि में, चीन को निर्यात मात्र 12.2 बिलियन डॉलर रहा, जबकि वहां से आयात बढ़कर 84.2 बिलियन डॉलर हो गया, जिसके परिणामस्वरूप लगभग 72 बिलियन डॉलर का भारी व्यापार घाटा हुआ।
चीनी विनिर्माण पर निर्भरता केवल हाई-टेक इलेक्ट्रॉनिक्स तक सीमित नहीं है; यह बुनियादी उपभोक्ता क्षेत्रों में भी व्याप्त है। उदाहरण के लिए, वित्त वर्ष 25 में भारत ने 20.85 मिलियन डॉलर के छतरियों का आयात किया, जिसमें चीन की हिस्सेदारी 17.7 मिलियन डॉलर रही। इसी तरह, कृषि मशीनरी के कुछ हिस्सों में चीन की हिस्सेदारी 90% तक है।
रणनीतिक शुल्क वृद्धि और प्रोत्साहन
इसे संबोधित करने के लिए, सरकार ने कथित तौर पर लगभग 100 उत्पादों की एक सूची तैयार की है जिनके टैरिफ ढांचे में बदलाव किया जा सकता है। वर्तमान में, इंजीनियरिंग सामान, स्टील उत्पाद, मशीनरी और सूटकेस जैसे उपभोक्ता सामानों पर आयात शुल्क 7.5-10% की सीमा में है। इन शुल्कों को बढ़ाकर, सरकार आयात को कम आकर्षक बनाने और घरेलू कंपनियों को उत्पादन बढ़ाने के लिए वित्तीय सहायता प्रदान करने की योजना बना रही है।
एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा, “कुछ ऐसी वस्तुएं हैं जिनमें हमारी विशिष्ट भौगोलिक क्षेत्रों पर निर्भरता बहुत अधिक है। हम आयात के जोखिम को कम करना चाहते हैं।” रणनीति केवल संरक्षणवाद तक सीमित नहीं है, बल्कि एक “डि-रिस्किंग” मॉडल की ओर बढ़ने की है जो उद्योग को स्थानीय सोर्सिंग मजबूत करने के लिए प्रोत्साहित करे।
गुणवत्ता और प्रतिस्पर्धा: मुख्य चुनौती
हालांकि नीतिगत इरादा स्पष्ट है, लेकिन आत्मनिर्भरता की राह में बड़ी चुनौतियां हैं। घरेलू उद्योग जगत का कहना है कि आयात प्रतिस्थापन केवल कीमत का मामला नहीं है, बल्कि गुणवत्ता और पैमाने का भी है। स्टील उद्योग के एक प्रतिनिधि ने कहा, “मुद्दा स्थानीय रूप से उत्पादित कुछ वस्तुओं की निम्न गुणवत्ता और उच्च कीमतें हैं, जो आयात के साथ प्रतिस्पर्धी नहीं हैं।”
विशेषज्ञों का तर्क है कि शुल्क वृद्धि तभी प्रभावी होगी जब उसके साथ भारत में व्यापार करने की लागत कम करने वाले संरचनात्मक सुधार भी किए जाएं—जैसे कि बिजली की दरों में कमी, कुशल लॉजिस्टिक्स और श्रम उत्पादकता में सुधार। इनके बिना, उच्च शुल्क उपभोक्ताओं पर मुद्रास्फीति का दबाव डाल सकते हैं।
ICRIER की प्रोफेसर और व्यापार विशेषज्ञ डॉ. अर्पिता मुखर्जी संतुलित दृष्टिकोण की आवश्यकता पर जोर देती हैं। उन्होंने कहा, “आपूर्ति श्रृंखलाओं के जोखिम को कम करना एक वैश्विक रुझान है, लेकिन भारत को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि व्यापारिक बाधाएं अनजाने में उसकी अपनी निर्यात प्रतिस्पर्धा को नुकसान न पहुंचाएं। इनमें से कई आयात मध्यवर्ती वस्तुएं हैं जिनका उपयोग भारतीय निर्माता करते हैं। ध्यान केवल दीवारें खड़ी करने के बजाय एक प्रतिस्पर्धी पारिस्थितिकी तंत्र बनाने पर होना चाहिए।”
पृष्ठभूमि और संदर्भ
यह “बजट पुश” पिछले एक दशक में शुरू की गई ‘मेक इन इंडिया’ और उत्पादन लिंक्ड प्रोत्साहन (PLI) योजनाओं का ही एक अगला चरण है। 1991 से पहले की अत्यधिक संरक्षित अर्थव्यवस्था से भारत एक एकीकृत वैश्विक खिलाड़ी बन गया है, लेकिन पिछले पांच वर्षों में “नियमित संरक्षणवाद” की वापसी देखी गई है। 2020 के सीमा तनाव के बाद, भारत ने गुणवत्ता नियंत्रण आदेश (QCO) और अनिवार्य BIS प्रमाणन जैसे कई गैर-टैरिफ अवरोध लागू किए हैं, जो विशेष रूप से निम्न-गुणवत्ता वाले आयात को लक्षित करते हैं।
आगे की राह
आगामी केंद्रीय बजट भारत के व्यापारिक संकल्प की परीक्षा होगी। जैसे-जैसे वैश्विक अर्थव्यवस्था “फ्रेंड-शोरिंग” और “चीन प्लस वन” रणनीतियों की ओर बढ़ रही है, भारत खुद को एक व्यवहार्य विनिर्माण केंद्र के रूप में स्थापित कर रहा है। हालांकि, एक ही भागीदार के साथ 72 बिलियन डॉलर के व्यापार घाटे को पाटने के लिए केवल वित्तीय बदलावों से अधिक की आवश्यकता है; इसके लिए नवाचार, गुणवत्ता मानकों और वैश्विक प्रतिस्पर्धा के प्रति दीर्घकालिक प्रतिबद्धता की आवश्यकता है।
