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भारतीय आईटी रणनीति: एआई की अस्थिरता और चुनिंदा निवेश के बीच संतुलन

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मुंबईकृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) और भारत के 250 अरब डॉलर के आईटी सेवा उद्योग को बदलने या खत्म करने की इसकी क्षमता को लेकर चल रही पुरानी बहस अब केवल सैद्धांतिक नहीं रह गई है, बल्कि एक कठोर बाजार वास्तविकता बन चुकी है। जैसे-जैसे दलाल स्ट्रीट भारी बिकवाली और बदलती कीमतों (Valuations) से जूझ रहा है, अब ध्यान इस बात पर केंद्रित हो गया है कि कौन सी कंपनियां स्वचालन (Automation) के “अपस्फीतिकारी” (Deflationary) तूफान को झेलकर भविष्य के व्यावसायिक परिवर्तन के “मुद्रास्फीतिकारी” (Inflationary) युग में मजबूती से उभर सकती हैं।

ऐसे माहौल में जहां निवेशकों की धारणा तेजी से “डर के चक्र” द्वारा संचालित हो रही है, उद्योग विश्लेषक अब संरचनात्मक रूप से पिछड़ने वाली कंपनियों और लंबी अवधि के विजेताओं के बीच अंतर करना शुरू कर रहे हैं। बीएनपी परिबा (BNP Paribas) के प्रमुख विश्लेषक कुमार राकेश का सुझाव है कि भले ही उद्योग वर्तमान में एक दर्दनाक और तत्काल व्यवधान झेल रहा है, लेकिन उन कंपनियों के लिए लंबी अवधि के विकास की संभावनाएं बरकरार हैं जो अपने बिजनेस मॉडल को सफलतापूर्वक बदल सकती हैं।

आईटी सेवाओं में एआई विकास के दो चरण

भारतीय आईटी परिदृश्य पर एआई का प्रभाव कोई एक अकेली घटना नहीं है, बल्कि दो अलग-अलग चरणों में सामने आने वाली प्रक्रिया है। पहला चरण, जो वर्तमान में जारी है, व्यावसायिक प्रक्रियाओं के स्वचालन पर केंद्रित है। यह रोबोटिक प्रोसेस ऑटोमेशन (RPA) का ही एक विकसित रूप है, लेकिन “एजेंटिक” एआई मॉडल द्वारा संचालित है जो पारंपरिक 10-15% लाभ की तुलना में कहीं अधिक उत्पादकता प्रदान करता है।

कुमार राकेश ने ‘ईटी नाउ’ के साथ बातचीत में बताया, “जहां भी चीजों को स्वचालित किया जा सकता है, वे स्वचालित हो जाएंगी।” उन्होंने इस चरण को स्वाभाविक रूप से “अपस्फीतिकारी” (Deflationary) बताया क्योंकि इसका प्राथमिक उद्देश्य लागत और मानव श्रम की गहनता को कम करना है। आईटी सेवा प्रदाताओं के लिए, इसका मतलब अक्सर रखरखाव और बैक-ऑफिस कार्यों के सौदों के आकार में कमी होना है, जिससे राजस्व पर तत्काल दबाव पड़ता है।

हालांकि, दूसरा चरण “सकारात्मक व्यवधान” का प्रतिनिधित्व करता है: व्यावसायिक परिवर्तन। इसमें उद्यम डेटा पर प्रशिक्षित लार्ज लैंग्वेज मॉडल (LLM) का उपयोग करके बिल्कुल नए एप्लिकेशन बनाना शामिल है, जैसे ग्राहकों के लिए हाइपर-कस्टमाइजेशन। यह चरण नए ‘यूज़ केस’ और राजस्व के ऐसे स्रोत बनाता है जो एआई-पूर्व युग में मौजूद नहीं थे।

“फ्रंट-लोडेड” व्यवधान की चुनौती

क्षेत्र के लिए मुख्य दुविधा इन दो चरणों का समय है। स्वचालन का नकारात्मक प्रभाव “फ्रंट-लोडेड” है—यानी यह अभी और इसी समय दिखाई दे रहा है और प्रभावी है। इसके विपरीत, व्यावसायिक परिवर्तन से होने वाला राजस्व लाभ अधिक समय मांगता है। मॉडल को विकसित होना होगा और उद्यमों को इन उपकरणों को अपने मुख्य व्यवसाय में एकीकृत करने के लिए आत्मविश्वास हासिल करना होगा।

राकेश ने समझाया, “दुर्भाग्य से, व्यावसायिक प्रक्रिया में व्यवधान अधिक फ्रंट-लोडेड है। हम पिछले डेढ़ साल से इसका प्रभाव देख रहे हैं। लेकिन व्यावसायिक परिवर्तन… में अधिक समय लगेगा। किसी स्तर पर, हम एआई कार्यान्वयन का लाभ भी देखना शुरू करेंगे।”

बाजार की धारणा: डर और लालच का चक्र

आईटी शेयरों में हालिया उतार-चढ़ाव—जहां दिग्गज कंपनियों के शेयरों में भी भारी गिरावट आई है—उस बाजार को दर्शाता है जो “दीर्घकालिक विकास” (Terminal Growth) की अवधारणा को लेकर संघर्ष कर रहा है। कई विदेशी संस्थागत निवेशकों (FII) ने अनिश्चितता से बचने के लिए अपनी स्थिति कम कर दी है।

राकेश इसकी तुलना 2024 के “डेटा सेंटर कैपेक्स” चक्र से करते हैं। शुरू में, एआई बुनियादी ढांचे के लिए खर्च की घोषणा करने वाली कंपनियों के शेयर ऊपर चढ़ गए थे (लालच का चरण)। आज, बाजार दूसरे छोर पर पहुंच गया है: नए खर्च को मार्जिन पर दबाव के रूप में देखा जाता है, और ओपनएआई या गूगल द्वारा हर नए मॉडल के लॉन्च को भारतीय आउटसोर्सिंग मॉडल के लिए खतरे के रूप में देखा जाता है (डर का चरण)।

विशेषज्ञ का उद्धरण: “डर और लालच का एक चक्र चलता है और अभी हम डर के ऊंचे स्तर पर हैं। हम एक ऐसे बिंदु पर पहुंचेंगे जहां किसी भी नए मॉडल के लॉन्च पर शेयर बाजार की कोई प्रतिक्रिया नहीं होगी। वह संभावित रूप से संकेत देगा कि निवेशकों के बीच डर चरम पर पहुंच गया है और वह निवेश का एक अच्छा समय हो सकता है।” — कुमार राकेश, विश्लेषक, बीएनपी परिबा।

लाभार्थियों की पहचान: रणनीतिक स्टॉक चयन

इस उथल-पुथल के बावजूद, चुनिंदा अवसर उभर रहे हैं। विश्लेषक उन कंपनियों पर ध्यान केंद्रित कर रहे हैं जहां राजस्व वृद्धि कर्मचारियों की संख्या से “अलग” (Decouple) होने लगी है—जो गैर-रेखीय विकास का एक स्पष्ट संकेतक है।

लार्ज-कैप चयन: इंफोसिस और टेक महिंद्रा

मिड-कैप चयन: पर्सिस्टेंट सिस्टम्स

250 अरब डॉलर का सवाल

भारत का आईटी क्षेत्र “लेबर आर्बिट्रेज” मॉडल (कम लागत पर प्रतिभा उपलब्ध कराना) पर बना था। दशकों तक, राजस्व सीधे कर्मचारियों की संख्या से जुड़ा रहा। एआई का आगमन इस संबंध के लिए खतरा है। हालांकि ‘नैसकॉम’ (NASSCOM) का मानना है कि एआई भारतीय कार्यबल को “प्रतिस्थापित” करने के बजाय उसे “सशक्त” करेगा, लेकिन इस बदलाव के लिए बड़े पैमाने पर कौशल विकास (Upskilling) की आवश्यकता है। अनुमान है कि अगले तीन वर्षों में लगभग 40-50% आईटी कार्यबल को एआई और मशीन लर्निंग में फिर से प्रशिक्षित होने की आवश्यकता होगी।

आगे की राह

भारतीय आईटी क्षेत्र वर्तमान में “देखो और प्रतीक्षा करो” की स्थिति में है। लागत बचाने वाले स्वचालन से मूल्य-निर्माण करने वाले परिवर्तन की ओर बढ़ने का सफर सीधा नहीं होगा, जिसका अर्थ है कि सभी कंपनियां इस बदलाव में समान रूप से सफल नहीं होंगी। हालांकि तत्काल दबाव महसूस किया जा रहा है, लेकिन उन कंपनियों के लिए लंबी अवधि का दृष्टिकोण आशावादी बना हुआ है जो एआई युग के तकनीकी और मनोवैज्ञानिक बदलावों को सफलतापूर्वक अपना सकती हैं।

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