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रणनीतिक बदलाव: भारत-यूरोपीय संघ व्यापार समझौते पर अमेरिकी मीडिया की नजर

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एक ऐतिहासिक मंगलवार को, जिसने वैश्विक वाणिज्य के परिदृश्य को नया आकार दिया, भारत और यूरोपीय संघ (EU) ने उस समझौते को अंतिम रूप दिया जिसे “सभी समझौतों की जननी” (mother of all deals) के रूप में सराहा जा रहा है। लगभग दो दशकों की छिटपुट बातचीत के बाद, यह समझौता दो अरब लोगों और वैश्विक सकल घरेलू उत्पाद (GDP) के 25% हिस्से को समाहित करने वाला एक मुक्त-व्यापार क्षेत्र बनाता है। हालांकि, प्रमुख अमेरिकी समाचार कक्षों के लिए, यह कहानी केवल आर्थिक आंकड़ों तक सीमित नहीं थी; यह संयुक्त राज्य अमेरिका की अनिश्चितता के विरुद्ध एक रणनीतिक “घेराबंदी” (hedging) के बारे में थी।

अटलांटिक के पार, अमेरिकी मीडिया आउटलेट्स ने इस सौदे को राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के नेतृत्व में बढ़ते व्यापार युद्धों की एक सीधी प्रतिक्रिया के रूप में पेश किया है। ‘न्यूयॉर्क टाइम्स’ से लेकर ‘वॉल स्ट्रीट जर्नल’ तक, विमर्श एक समान बना हुआ है: दुनिया के दो सबसे बड़े लोकतंत्र वाशिंगटन की शुल्क-आधारित कूटनीति (tariff-driven diplomacy) से अपनी अर्थव्यवस्थाओं को बचाने के लिए एक किला बना रहे हैं।

अमेरिकी प्रेस ने समाचार को कैसे प्रस्तुत किया

प्रमुख अमेरिकी आउटलेट्स की रिपोर्टिंग आर्थिक विस्मय और भू-राजनीतिक चिंता का मिश्रण दर्शाती है:

“ट्रम्प फैक्टर”: अभी ही क्यों?

इस उपलब्धि का समय वाशिंगटन के व्यापारिक वातावरण से अटूट रूप से जुड़ा हुआ है। 2025 के उत्तरार्ध से, भारत अमेरिका को होने वाले निर्यात पर 50% शुल्क (tariffs) का सामना कर रहा है—जो आधारभूत शुल्क और भारत द्वारा रूसी तेल की खरीद से जुड़े दंड का मिश्रण है। इसने भारत को भारी प्रतिबंधों वाले देशों के समान उच्च-शुल्क श्रेणी में लाकर खड़ा कर दिया।

इसी तरह, यूरोपीय संघ ने भी अपनी लड़ाइयाँ लड़ी हैं, जिसमें स्टील और एल्युमीनियम पर 25% शुल्क शामिल हैं। हालांकि 2025 के मध्य में हुए एक समझौते ने कुछ शुल्कों को 15% पर सीमित कर दिया था, लेकिन ब्रुसेल्स और वाशिंगटन के बीच विश्वास अभी भी खंडित बना हुआ है।

दिल्ली पहुँचने के बाद यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष उर्सुला वॉन डेर लेयेन ने कहा, “यूरोप और भारत आज इतिहास रच रहे हैं। हमने सभी समझौतों की जननी को सफलतापूर्वक संपन्न किया है… [यह] एक संदेश है कि सहयोग ही वैश्विक चुनौतियों का सबसे अच्छा उत्तर है।”

आर्थिक प्रभाव: कार, वाइन और कपड़ा

इस समझौते से 2032 तक भारत में यूरोपीय संघ के निर्यात के दोगुने होने की उम्मीद है। मुख्य आकर्षणों में शामिल हैं:

20 साल का सफर

इस एफटीए (FTA) के लिए बातचीत पहली बार 2007 में शुरू हुई थी। वर्षों तक, यह पेशेवर वीज़ा, डेयरी मानकों और यूरोपीय विलासिता की वस्तुओं पर उच्च भारतीय करों के विवादों के कारण रुकी रही। पिछले छह महीनों में आई अचानक तेजी का श्रेय व्यापक रूप से अमेरिकी व्यापारिक कार्रवाइयों के “रणनीतिक झटके” (strategic shock) को दिया जाता है, जिसने दोनों दिग्गजों को यह महसूस करने के लिए मजबूर किया कि “रणनीतिक स्वायत्तता” के लिए एक विविध व्यापार पोर्टफोलियो आवश्यक है।

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