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रूसी तेल पर अमेरिकी सख्ती, भारत में महंगे हो सकते हैं पेट्रोल-डीजल

रूसी तेल पर अमेरिकी सख्ती, भारत में महंगे हो सकते हैं पेट्रोल-डीजल - SamacharToday.co.in

रूस से तेल खरीदने को लेकर अमेरिका के सख्त रुख ने भारत समेत कई देशों की चिंता बढ़ा दी है। अमेरिकी विदेश मंत्री Marco Rubio ने संकेत दिया है कि रूसी तेल खरीद पर दी गई विशेष छूट (Waiver) को जल्द समाप्त किया जा सकता है। इस फैसले का असर वैश्विक ऊर्जा बाजार के साथ-साथ भारत की तेल आयात रणनीति पर भी पड़ सकता है।

क्या है पूरा मामला?

यूक्रेन-रूस युद्ध के बाद वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति को स्थिर बनाए रखने के लिए कुछ देशों को रूसी तेल खरीदने में सीमित छूट दी गई थी। इस व्यवस्था का लाभ उठाते हुए भारत ने रियायती दरों पर बड़ी मात्रा में रूसी कच्चा तेल खरीदा, जिससे घरेलू ईंधन कीमतों पर दबाव कम रखने में मदद मिली।

अब अमेरिका इस व्यवस्था की समीक्षा कर रहा है और छूट समाप्त होने की संभावना जताई जा रही है। यदि ऐसा होता है, तो रूस से सस्ता तेल खरीदना पहले की तुलना में अधिक कठिन हो सकता है।

भारत पर क्या होगा असर?

भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयातित कच्चे तेल से पूरा करता है। पिछले कुछ वर्षों में रूस भारत के प्रमुख तेल आपूर्तिकर्ताओं में शामिल हो गया है।

यदि रूसी तेल की उपलब्धता या खरीद पर प्रतिबंधात्मक परिस्थितियां बनती हैं, तो भारत को अन्य स्रोतों से अपेक्षाकृत महंगा कच्चा तेल खरीदना पड़ सकता है। इसका असर निम्न क्षेत्रों पर पड़ सकता है:

  • पेट्रोल और डीजल की लागत
  • परिवहन खर्च
  • औद्योगिक उत्पादन लागत
  • महंगाई दर

हालांकि अंतिम प्रभाव वैश्विक कच्चे तेल की कीमतों, विनिमय दरों और सरकारी नीतियों पर भी निर्भर करेगा।

अमेरिका का क्या प्रस्ताव है?

रिपोर्ट्स के अनुसार अमेरिका ने भारत सहित सहयोगी देशों को वैकल्पिक ऊर्जा आपूर्ति उपलब्ध कराने की इच्छा जताई है। उद्देश्य यह है कि वैश्विक बाजार में ऊर्जा आपूर्ति बाधित न हो और देशों की निर्भरता सीमित स्रोतों पर कम हो।

जून की समयसीमा पर नजर

ऊर्जा बाजार की नजर अब जून के मध्य में होने वाले संभावित निर्णय पर टिकी हुई है। यदि छूट व्यवस्था में बदलाव होता है, तो वैश्विक तेल बाजार में नई हलचल देखने को मिल सकती है।

भारत के लिए चुनौती

विशेषज्ञों का मानना है कि भारत को ऊर्जा सुरक्षा और रणनीतिक स्वायत्तता के बीच संतुलन बनाए रखना होगा। देश लंबे समय से विभिन्न स्रोतों से तेल आयात कर अपनी आपूर्ति श्रृंखला को विविध बनाने की नीति पर काम कर रहा है।

फिलहाल निवेशकों, तेल कंपनियों और नीति निर्माताओं की नजर अमेरिकी फैसले पर बनी हुई है, क्योंकि इसका असर केवल भारत ही नहीं बल्कि वैश्विक ऊर्जा बाजार पर भी पड़ सकता है।

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