सबको पता है कि हमारा देश भारत पेट्रोलियम पदार्थों (पेट्रोल, डीजल, एल.पी.जी.) के मामले में विदेशों – खासकर खाड़ी देशों पर निर्भर है। इन पदार्थों के लिए हमारा अपना कोई संसाधन तो है नहीं – हम हमेशा इनके आयात पर ही निर्भर रहे हैं। तो फिर अपने नियंत्रण से बाहर, एक अंतरराष्ट्रीय संकट के समय उत्पन्न तेल संकट को बर्दाश्त करने के अलावा हमारे पास क्या रास्ता है? इस परिस्थिति को सहन तो करना ही पड़ेगा, और उससे भी पहले यह स्वीकार करना पड़ेगा कि संकट तो वाकई है!
आश्चर्य की बात यह है कि कुछ पत्रकारों का दल सरकारी पक्ष बन कर “कोई किल्लत नहीं है/कोई कमी नहीं है/कोई संकट नहीं है” वाले स्टैंड को अनावश्यक रूप से प्रचारित कर रहा है तो दूसरी ओर पत्रकारों का दूसरा दल पानी पी-पी कर इस संकट के लिए सरकार को कोस रहा है।
सच तो ये है कि दोनों दलों का ही स्टैंड गलत है। संकट तो है और है बहुत विकट। इतना विकट कि हॉस्पिटैलिटी इंडस्ट्री चौपट होने के कगार पर है। सबसे बड़ी मुसीबत झेल रहे हैं छोटे-छोटे रोडसाइड ढाबा, होटल चलाकर अपना तो अपना, लाखों कामगारों का पेट पालने/काम चलाने वाले। हजारों मेस बंद होने की कगार पर है। ऐसे में उन स्टूडेंट्स का, अकेले रहने वाले बैचलर कामगारों का क्या होगा जो दो वक्त की रोटी के लिए इन मेस/ढाबों/होटलों पर निर्भर हैं?
ऐसे में सरकार सहित उनका पक्ष रखने वाले और विरोध करने – दोनों तरह की सोच वालों का दायित्व यह बनता है कि इस कटु सच्चाई का सामना करें कि यह संकट अवश्यंभावी है और हमें इसका सामना करना ही होगा। क्यों? क्योंकि हम तेल उत्पादक देश नहीं हैं और पेट्रोलियम पदार्थों के लिए दूसरे देशों, खासकर खाड़ी के देशों पर निर्भर हैं। साथ ही यह समय इस बात का भी है कि इस दुस्समय का सामना करने की रणनीति बनाने की, वैकल्पिक उपायों पर चर्चा करके, उन्हें उपलब्ध कराकर पेट्रोलियम पदार्थों खास कर एल.पी.जी. पर निर्भरता कम करने की दिशा में काम करने की ।
बहुत ही प्रासंगिक सवाल यह भी है कि – यदि हम लकड़ी के चूल्हे से, कोयले के चूल्हे के रास्ते होते हुए गैस के चूल्हे तक पहुंचे हैं, तो आवश्यकता पड़ने पर क्या पुनः कोयले के चूल्हे तक वापस नहीं जा सकते? वो भी तात्कालिक रूप से, आपात परिस्थितियों में!
वर्तमान हालात में सरकार से यह अपेक्षा भी है और निवेदन भी – कि कमर्शियल एल.पी.जी. की कमी का विकल्प प्रस्तुत करते हुए त्वरित उपाय करें ताकि पूरे देश में हॉस्टल/पी.जी. में रहने वाले करोड़ों विद्यार्थियों/कामगारों का नियमित भोजन बंद न हो जाए और हॉस्पिटैलिटी इंडस्ट्री भी सुचारू रूप से चलती रहे।
