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स्थिरता की ओर कदम: केंद्र ने FY27 के लिए ऋण कम करने का रखा लक्ष्य

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भारत की व्यापक आर्थिक स्थिरता को और मजबूत करने के उद्देश्य से, केंद्र सरकार वित्त वर्ष 2026-27 (FY27) में अपने ऋण-जीडीपी अनुपात (Debt-to-GDP ratio) को घटाकर लगभग 54.5–55% करने पर विचार कर रही है। यह लक्ष्य वित्त वर्ष 2026 के लिए अनुमानित 56.1% से एक महत्वपूर्ण गिरावट को दर्शाता है।

यह कदम राजकोषीय सुदृढ़ीकरण (Fiscal Consolidation) की दिशा में एक “नपा-तुला” दृष्टिकोण है, जिसका उद्देश्य आर्थिक विकास को प्रभावित किए बिना राष्ट्र के ऋण बोझ को धीरे-धीरे कम करना है। सरकारी अधिकारियों के अनुसार, FY27 की अंतिम रणनीति 7 जनवरी, 2026 को जारी होने वाले जीडीपी के पहले अग्रिम अनुमानों के बाद तय की जाएगी।

नीति में बदलाव: ऋण अब नया ‘फिस्कल एंकर’

वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने वित्त वर्ष 2026 के बजट के दौरान राजकोषीय नीति में एक बड़ा बदलाव पेश किया था। दशकों से, भारत राजकोषीय घाटे (Fiscal Deficit) को अपनी अर्थव्यवस्था की सेहत मापने का मुख्य पैमाना मानता था। अब, सरकार ने ‘ऋण-जीडीपी अनुपात’ को अपना मुख्य “फिस्कल एंकर” बना दिया है।

संशोधित रोडमैप के तहत, सरकार का लक्ष्य वित्त वर्ष 2031 तक कुल ऋण को जीडीपी के 50% तक लाना है। यह बदलाव वैश्विक मानकों के अनुरूप है, जहाँ वार्षिक घाटे के बजाय दीर्घकालिक ऋण स्थिरता को अर्थव्यवस्था के लचीलेपन का बेहतर संकेतक माना जाता है।

“भारत के ऋण-जीडीपी अनुपात को कम करना सरकार का मुख्य केंद्र होगा… उच्च ब्याज दरों पर ऋण का बड़ा भंडार विकास में बाधा बन सकता है,” वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने हाल ही में ‘विकसित भारत’ के विजन को रेखांकित करते हुए कहा।

सुदृढ़ीकरण की रूपरेखा

सरकार ने ऋण में कमी के लिए तीन संभावित परिदृश्य (Scenarios) तैयार किए हैं, जो 10%, 10.5% और 11% की नाममात्र जीडीपी विकास दर पर आधारित हैं।

चुनौतियां और अंतरराष्ट्रीय राय

अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) ने भारत के विकास की सराहना की है, लेकिन ऋण लक्ष्यों को और अधिक “महत्वाकांक्षी” बनाने का सुझाव दिया है। IMF ने ध्यान दिलाया कि हालांकि केंद्र का ऋण कम हो रहा है, लेकिन सामान्य सरकारी ऋण (जिसमें राज्यों की देनदारियां भी शामिल हैं) अभी भी चिंता का विषय है, जो लगभग 80% पर बना हुआ है।

तेजी से ऋण कम करने के फायदे:

  1. ब्याज खर्च में कमी: भारत अपने राजस्व का एक बड़ा हिस्सा ब्याज भुगतान पर खर्च करता है, जिसे कम किया जा सकता है।

  2. भविष्य के झटकों से सुरक्षा: ऋण कम होने से भविष्य के वैश्विक आर्थिक संकटों से निपटने के लिए वित्तीय क्षमता बढ़ती है।

  3. क्रेडिट रेटिंग में सुधार: निरंतर ऋण कटौती से वैश्विक रेटिंग एजेंसियां भारत की साख को बेहतर मानती हैं।

आगे की राह

आगामी बजट सत्र की तैयारी करते समय, सरकार का ध्यान “पारदर्शिता और स्थिरता” पर बना हुआ है। ऋण के लिए एक स्पष्ट रास्ता तय करके, केंद्र निवेशकों और बॉन्ड बाजारों को भरोसा दिलाता है। हालांकि, चुनौती यह है कि ऋण कम करने के साथ-साथ बुनियादी ढांचे और विनिर्माण में सार्वजनिक निवेश (Capex) को भी बनाए रखा जाए। अगले कुछ हफ्तों के जीडीपी आंकड़े यह तय करेंगे कि सरकार ऋण कटौती की राह पर कितनी तेजी से आगे बढ़ेगी।

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