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दिग्गज अभिनेता रॉबर्ट डुवैल का 95 वर्ष की आयु में निधन

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SamacharToday.co.in - दिग्गज अभिनेता रॉबर्ट डुवैल का 95 वर्ष की आयु में निधन - Image Crdited by Euronews

लॉस एंजिल्स — फिल्म इतिहास के सबसे शानदार करियर में से एक का पटाक्षेप हो गया है। ‘द गॉडफादर‘ और ‘एपोकैलिप्स नाउ’ जैसी कालजयी फिल्मों के माध्यम से अभिनय की नई परिभाषा गढ़ने वाले रॉबर्ट डुवैल का रविवार को उनके घर पर निधन हो गया। वह 95 वर्ष के थे।

उनके निधन की पुष्टि सोमवार को उनकी पत्नी लुसियाना डुवैल ने एक भावुक बयान के जरिए की। उन्होंने लिखा, “कल हमने अपने प्रिय पति, अनमोल मित्र और हमारे समय के महानतम अभिनेताओं में से एक को अलविदा कह दिया। बॉबी ने घर पर शांति से अंतिम सांस ली।”

डुवैल अपने पीछे छह दशकों का एक ऐसा समृद्ध इतिहास छोड़ गए हैं, जहाँ उन्होंने प्रसिद्धि की चकाचौंध के बजाय चरित्र की गहराई को प्राथमिकता दी। चाहे वह एक शांत एकांतवासी की भूमिका हो, एक शातिर माफिया वकील की या युद्ध के शौकीन कर्नल की, डुवैल की मौजूदगी पर्दे पर विश्वसनीयता की गारंटी थी।

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कौंसिग्लिएर और कर्नल: यादगार भूमिकाएं

यूं तो डुवैल की फिल्मोग्राफी बहुत विशाल है, लेकिन उन्हें निर्देशक फ्रांसिस फोर्ड कोपोला के साथ उनके दो महान कार्यों के लिए हमेशा याद किया जाएगा। ‘द गॉडफादर’ (1972) और ‘द गॉडफादर पार्ट II’ (1974) में उन्होंने टॉम हेगन की भूमिका निभाई, जो कोरलियोन अपराध परिवार के वफादार वकील या ‘कौंसिग्लिएर’ थे। अल पचिनो और जेम्स कान जैसे उग्र अभिनेताओं के बीच, डुवैल का किरदार “तूफान में शांति” की तरह था। इस भूमिका के लिए उन्हें अपना पहला ऑस्कर नामांकन मिला।

हालांकि, 1979 की वियतनाम युद्ध पर आधारित महाकाव्य फिल्म ‘एपोकैलिप्स नाउ‘ में डुवैल ने सहायक भूमिका में अभिनय का वह प्रदर्शन किया, जो शायद सिनेमा इतिहास में सबसे प्रसिद्ध है। लेफ्टिनेंट कर्नल विलियम किल्गोर के रूप में, गिरते हुए मोर्टारों के बीच खड़े होकर उन्होंने वह ऐतिहासिक संवाद बोला: “मुझे सुबह के समय नेपाम की गंध बहुत पसंद है।”

शुरुआत में यह किरदार ‘कर्नल कार्नेज’ नाम के एक कार्टूनिस्ट खलनायक के रूप में लिखा गया था, लेकिन डुवैल ने अपने सूक्ष्म शोध के जरिए इसे एक डरावने और वास्तविक पेशेवर सैनिक का रूप दिया। 2015 में लैरी किंग को दिए एक साक्षात्कार में उन्होंने कहा था, “मैंने अपना होमवर्क किया था, मैंने गहरा शोध किया था।”

बू रेडली से ऑस्कर के स्वर्ण तक

1931 में सैन डिएगो में जन्मे डुवैल ने कोरियाई युद्ध के दौरान अमेरिकी सेना में सेवा दी थी। इसके बाद वह अभिनय सीखने के लिए न्यूयॉर्क चले गए, जहाँ डस्टिन हॉफमैन और जीन हैकमैन उनके सहपाठी और मित्र बने। इन तीनों ने आगे चलकर अमेरिकी अभिनय शैली को पूरी तरह बदल दिया।

हॉलीवुड के मानकों के अनुसार डुवैल ने अभिनय की दुनिया में थोड़ी देर से कदम रखा। 31 साल की उम्र में उन्होंने ‘टू किल अ मॉकिंगबर्ड’ (1962) से अपनी शुरुआत की। बिना किसी संवाद के, केवल शारीरिक हाव-भाव से उन्होंने ‘बू रेडली’ के रहस्यमयी चरित्र को जीवंत कर दिया, जिसे दर्शक आज भी नहीं भूल पाए हैं।

1983 में फिल्म ‘टेंडर मर्सीज़’ के लिए उन्हें सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का ऑस्कर पुरस्कार मिला। इसमें उन्होंने एक ढलते हुए शराबी कंट्री सिंगर ‘मैक स्लेज’ की भूमिका निभाई थी। इस फिल्म में उन्होंने खुद गाने गाए थे, जो उनके काम के प्रति समर्पण को दर्शाता है।

बहुमुखी निर्देशक और ‘काउबॉय’

डुवैल केवल कैमरे के सामने तक ही सीमित नहीं रहे। 1997 में उन्होंने ‘द अपोस्टल’ फिल्म लिखी, निर्देशित की और उसमें अभिनय भी किया। बड़े स्टूडियो द्वारा ठुकराए जाने के बाद उन्होंने खुद इस फिल्म का वित्तपोषण किया था। इसके लिए उन्हें एक बार फिर सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का ऑस्कर नामांकन मिला।

ऑस्कर और ब्लॉकबस्टर फिल्मों के बावजूद, डुवैल अक्सर कहते थे कि उनकी सबसे पसंदीदा भूमिका 1989 की टीवी मिनी-सीरीज़ ‘लोनसम डव’ में टेक्सस रेंजर ऑगस्टस मैकक्रे की थी। उनके लिए ‘वेस्टर्न’ शैली अमेरिकी संस्कृति का असली आइना थी। उनकी पत्नी लुसियाना ने श्रद्धांजलि देते हुए कहा, “बॉब का अपने काम के प्रति जुनून उतना ही गहरा था जितना उनका चरित्रों, अच्छे भोजन और महफिलें सजाने के प्रति प्यार।”

सिनेमा जगत की श्रद्धांजलि

डुवैल के निधन से हॉलीवुड में शोक की लहर है। निर्देशक फ्रांसिस फोर्ड कोपोला ने उन्हें “दुनिया के चार या पांच महानतम अभिनेताओं में से एक” बताया। फिल्म समीक्षकों का मानना है कि डुवैल उस पीढ़ी के अभिनेता थे जिन्होंने अभिनय को महज नाटक से हटाकर एक जीती-जागती वास्तविकता में बदल दिया।

रॉबर्ट डुवैल के परिवार में उनकी पत्नी लुसियाना हैं। हालांकि उनकी अपनी कोई संतान नहीं थी, लेकिन अभिनय सीखने वाले अनगिनत कलाकार उन्हें अपना गुरु और उनकी फिल्मों को अभिनय की पाठ्यपुस्तक मानते हैं।

शमा एक उत्साही और संवेदनशील लेखिका हैं, जो समाज से जुड़ी घटनाओं, मानव सरोकारों और बदलते समय की सच्ची कहानियों को शब्दों में ढालती हैं। उनकी लेखन शैली सरल, प्रभावशाली और पाठकों के दिल तक पहुँचने वाली है। शमा का विश्वास है कि पत्रकारिता केवल खबरों का माध्यम नहीं, बल्कि विचारों और परिवर्तन की आवाज़ है। वे हर विषय को गहराई से समझती हैं और सटीक तथ्यों के साथ ऐसी प्रस्तुति देती हैं जो पाठकों को सोचने पर मजबूर कर दे। उन्होंने अपने लेखों में प्रशासन, शिक्षा, पर्यावरण, महिला सशक्तिकरण और सामाजिक बदलाव जैसे मुद्दों को विशेष रूप से उठाया है। उनके लेख न केवल सूचनात्मक होते हैं, बल्कि समाज में जागरूकता और सकारात्मक दृष्टिकोण विकसित करने की दिशा भी दिखाते हैं।

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