Geo-politics
अमेरिका की दोहरी नीति: बांग्लादेश को राहत, भारतीय निर्यातकों पर भारी बोझ
नई दिल्ली — अमेरिका और बांग्लादेश के बीच एक ऐतिहासिक व्यापार समझौते की घोषणा के बाद भारत में एक बड़ा राजनीतिक तूफान खड़ा हो गया है। सोमवार को वाशिंगटन डी.सी. में हस्ताक्षरित इस समझौते के तहत, अमेरिकी कपास या मानव निर्मित फाइबर का उपयोग करके बनाए गए बांग्लादेशी कपड़ों और वस्त्रों को ‘जीरो-टैरिफ’ (शून्य शुल्क) पहुंच प्रदान की गई है। इसके ठीक विपरीत, नई दिल्ली और वाशिंगटन के बीच हाल ही में हुए एक अंतरिम व्यापार समझौते के तहत, अमेरिका को भारतीय कपड़ा निर्यात पर 18% की काफी उच्च पारस्परिक दर से कर लगाया जाएगा।
इस घटनाक्रम ने भारतीय विपक्ष को नया मुद्दा दे दिया है, जिसने केंद्र सरकार पर इस “विनाशकारी” वार्ता के लिए तीखा हमला बोला है। आलोचकों का तर्क है कि भारत का कपड़ा उद्योग, जो राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ और रोजगार का एक बड़ा जरिया है, अपने पड़ोसी की तुलना में गंभीर प्रतिस्पर्धात्मक नुकसान की स्थिति में आ गया है।
समझौतों का विवरण
नौ महीने की बातचीत के बाद संपन्न हुए अमेरिका-बांग्लादेश समझौते पर बांग्लादेश के वाणिज्य सलाहकार शेख बशीर उद्दीन और अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि (USTR) जेमिसन ग्रीर ने हस्ताक्षर किए। इस समझौते के तहत, बांग्लादेश ने निम्नलिखित लाभ सुरक्षित किए:
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शून्य पारस्परिक शुल्क: विशेष रूप से उन कपड़ा और परिधान वस्तुओं के लिए जो कपास और सिंथेटिक फाइबर जैसे अमेरिकी-उत्पादित कच्चे माल का उपयोग करते हैं।
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सामान्य शुल्कों में कटौती: अन्य बांग्लादेशी निर्यातों पर समग्र पारस्परिक शुल्क को पिछले उच्च स्तरों से घटाकर 19% कर दिया गया है।
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व्यापक बाजार पहुंच: बांग्लादेश द्वारा अमेरिकी गेहूं, सोयाबीन और तरलीकृत प्राकृतिक गैस (LNG) के आयात के प्रावधान, साथ ही अमेरिका द्वारा निर्धारित बौद्धिक संपदा और ई-कॉमर्स मानकों का पालन।
वहीं, फरवरी 2026 की शुरुआत में घोषित भारत-अमेरिका अंतरिम समझौते में अमेरिका ने भारतीय वस्तुओं पर दंडात्मक शुल्क को 50% (जो 2025 के व्यापार युद्ध के दौरान लगाया गया था) से घटाकर 18% कर दिया। इसके बदले में, भारत सभी अमेरिकी औद्योगिक वस्तुओं और कृषि उत्पादों की एक विस्तृत श्रृंखला पर शुल्क समाप्त करने या कम करने पर सहमत हुआ, साथ ही बहुत उच्च स्तर पर “बाय अमेरिकन” (अमेरिकी उत्पाद खरीदें) की प्रतिबद्धता भी जताई।
विपक्ष की तीखी आलोचना
शिवसेना (UBT) की नेता और राज्यसभा सांसद प्रियंका चतुर्वेदी ने वाणिज्य मंत्रालय के खिलाफ मोर्चा संभाला। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर उन्होंने इस सौदे के पीछे के “तर्क” पर सवाल उठाते हुए कहा कि हालिया व्यापार तनाव से पहले भारतीय कपड़ों पर केवल 3% शुल्क लगता था।
“वाणिज्य मंत्री के तर्क के अनुसार, ट्रंप-पूर्व 3% टैरिफ के मुकाबले डील के बाद का 18% टैरिफ बेहतर है। हमें इस ‘जीनियस’ डील के लिए तालियां बजाने को कहा गया था,” चतुर्वेदी ने आरोप लगाया। उन्होंने कच्चे माल के आयात में असमानता की ओर इशारा करते हुए कहा कि जहां भारत 200 मिलियन डॉलर का अमेरिकी कपास आयात करता है, वहीं बांग्लादेश 250 मिलियन डॉलर का आयात करता है। उन्होंने आगे लिखा, “अब वाणिज्य मंत्री हमें बताएंगे कि बांग्लादेश के 0% के मुकाबले 18% टैरिफ के साथ भारतीय कपड़ा निर्यातकों को क्या लाभ मिलेगा।”
विपक्ष की आलोचना का केंद्र सौदे की “पारस्परिकता” है। उनका तर्क है कि जहां भारत ने अमेरिकी किसानों और औद्योगिक सामानों के लिए अपना विशाल बाजार शून्य शुल्क पर खोल दिया है, वहीं उसका अपना प्राथमिक निर्यात क्षेत्र—कपड़ा—अभी भी दोहरे अंकों के शुल्क के बोझ तले दबा हुआ है।
भारत के लिए आर्थिक निहितार्थ
कृषि के बाद कपड़ा और परिधान क्षेत्र भारत का दूसरा सबसे बड़ा नियोक्ता है। अमेरिका भारत का सबसे बड़ा निर्यात गंतव्य है, जो इसके 38 अरब डॉलर के कपड़ा निर्यात उद्योग का लगभग 29% हिस्सा है। विश्लेषकों का मानना है कि 18% शुल्क के कारण निम्नलिखित परिणाम हो सकते हैं:
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बाजार हिस्सेदारी का नुकसान: अमेरिकी खरीदार शून्य-शुल्क लाभ का लाभ उठाने के लिए अपने ऑर्डर बांग्लादेश की ओर मोड़ सकते हैं।
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MSMEs पर दबाव: सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम (MSMEs), जिनका कपड़ा क्षेत्र में वर्चस्व है, उनके पास 18% कर को झेलने के लिए पर्याप्त मार्जिन नहीं है।
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शेयर बाजार में अस्थिरता: इस खबर के बाद, केपीआर मिल और गोकलदास एक्सपोर्ट्स जैसी प्रमुख भारतीय कपड़ा कंपनियों के शेयरों में 3% से 5% की तेज गिरावट देखी गई।
वैश्विक व्यापार युद्ध का संदर्भ
वर्तमान स्थिति 2025 में दूसरे ट्रंप प्रशासन के तहत शुरू हुए वैश्विक व्यापार युद्ध का परिणाम है। भारत पर शुरू में 50% का भारी शुल्क लगाया गया था (जिसमें रूसी तेल की खरीद जारी रखने के लिए 25% दंडात्मक शुल्क शामिल था)। हाल ही में इसे घटाकर 18% करना भारत सरकार द्वारा एक “ऐतिहासिक मील के पत्थर” और तनाव कम करने के रूप में पेश किया गया था।
हालांकि, बांग्लादेश सौदा अमेरिका की एक अधिक सूक्ष्म रणनीति को प्रकट करता है: उन “संरेखित भागीदारों” (aligned partners) को पुरस्कृत करना जो अपनी आपूर्ति श्रृंखलाओं को अमेरिकी कच्चे माल के साथ जोड़ते हैं। बांग्लादेश की अंतरिम सरकार के प्रमुख मुहम्मद यूनुस ने कहा कि यह सौदा “बांग्लादेश को अमेरिकी व्यापार नीति के अनुरूप बनाता है,” जो एक ऐसा रणनीतिक संरेखण है जिसे भारत ने कपड़ा क्षेत्र में अभी तक नहीं अपनाया है।
