International Security
निखिल गुप्ता ने पन्नून हत्याकांड की साजिश में जुर्म कबूला
न्यूयॉर्क — भारत और अमेरिका के बीच राजनयिक संबंधों में तनाव पैदा करने वाले एक मामले में एक नाटकीय मोड़ आया है। 54 वर्षीय भारतीय नागरिक निखिल गुप्ता, जिसे “निक” के नाम से भी जाना जाता है, ने शुक्रवार को मैनहट्टन फेडरल कोर्ट में अमेरिका स्थित प्रो-खालिस्तानी कार्यकर्ता गुरपतवंत सिंह पन्नून की हत्या की साजिश रचने के आरोपों में अपना जुर्म स्वीकार कर लिया है।
अमेरिकी मजिस्ट्रेट जज सारा नेटबर्न के समक्ष दर्ज किया गया यह “गिल्टी प्ली” (जुर्म की स्वीकारोक्ति) न्याय विभाग (DOJ) द्वारा की जा रही जांच में एक महत्वपूर्ण मोड़ है। अभियोजकों का आरोप है कि गुप्ता एक भारतीय सरकारी कर्मचारी—जिसकी पहचान अदालती दस्तावेजों में विकास यादव के रूप में की गई है—के सीधे निर्देश पर काम कर रहे थे। इस साजिश का उद्देश्य पन्नून को खामोश करना था, जो भारतीय सरकार के मुखर आलोचक और प्रतिबंधित संगठन ‘सिख फॉर जस्टिस’ (SFJ) के नेता हैं।
आरोप और सजा का प्रावधान
गुप्ता ने दूसरे सुपरसीडिंग इंडिक्टमेंट (पूरक अभियोग) में शामिल सभी तीन काउंट्स में जुर्म कबूल किया:
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पैसे लेकर हत्या (Murder-for-hire): अधिकतम 10 साल की सजा।
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पैसे लेकर हत्या की साजिश (Conspiracy): अधिकतम 10 साल की सजा।
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मनी लॉन्ड्रिंग की साजिश: अधिकतम 20 साल की सजा।
कुल मिलाकर, भारतीय नागरिक को अधिकतम 40 साल की जेल हो सकती है। अमेरिकी जिला न्यायाधीश विक्टर मरेरो ने सजा सुनाने के लिए 29 मई, 2026 की तारीख तय की है। तब तक, गुप्ता ब्रुकलिन में संघीय हिरासत में रहेंगे, जहां उन्हें जून 2024 में चेक गणराज्य से प्रत्यर्पण के बाद से रखा गया है।
“विदेशी एजेंटों के लिए एक संदेश”
न्यूयॉर्क के दक्षिणी जिले के अमेरिकी अटॉर्नी जे क्लेटन ने इस स्वीकारोक्ति के बाद कड़ी चेतावनी जारी की। क्लेटन ने कहा, “निखिल गुप्ता ने न्यूयॉर्क शहर में एक अमेरिकी नागरिक की हत्या की साजिश रची। उन्होंने सोचा कि इस देश के बाहर से वह बिना किसी परिणाम के किसी की हत्या कर सकते हैं, सिर्फ इसलिए क्योंकि वह व्यक्ति अपनी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार का उपयोग कर रहा था। लेकिन वह गलत थे।” उन्होंने आगे कहा कि “नापाक विदेशी तत्वों” के लिए संदेश स्पष्ट है: “संयुक्त राज्य अमेरिका और हमारे लोगों से दूर रहें।”
इसी तरह, एफबीआई (FBI) के सहायक निदेशक जेम्स सी. बार्नकल जूनियर ने टिप्पणी की कि गुप्ता की हरकतें “अंतरराष्ट्रीय दमन” (transnational repression) का एक प्रयास थीं, जिसका उद्देश्य अमेरिकी धरती पर एक राजनीतिक असंतुष्ट की आवाज को गैरकानूनी तरीके से दबाना था।
साजिश का क्रम और पृष्ठभूमि
यह साजिश मई 2023 की है, जब गुप्ता को कथित तौर पर विकास यादव (CC-1) नामक व्यक्ति ने भर्ती किया था। यादव ने खुद को भारतीय सरकार में “वरिष्ठ फील्ड अधिकारी” बताया था। अभियोजकों के अनुसार, यादव ने गुप्ता को न्यूयॉर्क में पन्नून की हत्या के लिए एक ‘हिटमैन’ खोजने का निर्देश दिया।
अदालत में पेश किए गए सबूतों से पता चला कि:
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अग्रिम भुगतान: 9 जून, 2023 को मैनहट्टन में एक अंडरकवर अधिकारी को 15,000 डॉलर का अग्रिम नकद भुगतान किया गया।
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निगरानी: यादव ने गुप्ता को पन्नून का घर का पता और फोन नंबर जैसी निजी जानकारी प्रदान की।
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निर्देश: गुप्ता ने कथित तौर पर “हिटमैन” को निर्देश दिया था कि वह जून 2023 में भारत और अमेरिका के बीच उच्च स्तरीय कूटनीतिक बैठकों के दौरान इस हत्या को अंजाम न दे।
यह साजिश तब विफल हो गई जब गुप्ता को 30 जून, 2023 को चेक गणराज्य में गिरफ्तार कर लिया गया। लंबी कानूनी लड़ाई के बाद, उन्हें पिछले साल अमेरिका प्रत्यर्पित किया गया था।
राजनयिक प्रभाव और भारत की प्रतिक्रिया
भारतीय संलिप्तता के आरोपों ने भारत-अमेरिका संबंधों में काफी खटास पैदा की है। हालांकि भारत ने शुरू में इन आरोपों को “बेतुका” बताया था, लेकिन बाद में इस मामले की जांच के लिए एक उच्च स्तरीय जांच समिति गठित की। विदेश मंत्रालय (MEA) ने स्पष्ट किया है कि अमेरिकी अभियोग में नामित व्यक्ति (विकास यादव) अब भारत सरकार का कर्मचारी नहीं है।
भारत ने लगातार कहा है कि न्यायेतर हत्याएं (extrajudicial killings) सरकार की नीति के खिलाफ हैं। हालांकि, कनाडा के प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो द्वारा हरदीप सिंह निज्जर की हत्या में भारतीय एजेंटों की संलिप्तता के आरोपों के बाद इस मामले को और अधिक अंतरराष्ट्रीय ध्यान मिला।
गुरपतवंत सिंह पन्नून ने इस जुर्म की स्वीकारोक्ति पर प्रतिक्रिया देते हुए इसे राज्य प्रायोजित साजिश की “न्यायिक पुष्टि” बताया। भारत सरकार द्वारा आतंकवादी घोषित किए जाने के बावजूद, पन्नून ने कहा कि वह “खालिस्तान” के लिए अपना अभियान शांतिपूर्ण राजनीतिक तरीकों से जारी रखेंगे।
एक नाजुक संतुलन
जैसे-जैसे गुप्ता मई में अपनी सजा का इंतजार कर रहे हैं, यह मामला नई दिल्ली और वाशिंगटन के बीच “रणनीतिक साझेदारी” की एक कसौटी बना हुआ है। हालांकि दोनों देशों ने हाल ही में इस विवाद से आगे बढ़ने की कोशिश की है, लेकिन न्यूयॉर्क में चल रही यह कानूनी कार्यवाही अंतरराष्ट्रीय संप्रभुता और राष्ट्रीय सुरक्षा की जटिलताओं की याद दिलाती रहती है।
