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विवादास्पद शीर्षक पर नेटफ्लिक्स के खिलाफ सोशल मीडिया पर भारी आक्रोश

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SamacharToday.co.in - विवादास्पद शीर्षक पर नेटफ्लिक्स के खिलाफ सोशल मीडिया पर भारी आक्रोश - AI Generated Image

नई दिल्लीभारत के डिजिटल परिदृश्य में मंगलवार को उस समय भारी हलचल देखी गई जब सोशल मीडिया मंच X (पूर्व में ट्विटर) पर #ShameOnNetflix और #GhoosKhorPandat हैशटैग टॉप ट्रेंड्स में शामिल रहे। यह ऑनलाइन विरोध वैश्विक ओटीटी दिग्गज नेटफ्लिक्स (Netflix) के एक आगामी प्रोजेक्ट के खिलाफ है। उपयोगकर्ताओं का दावा है कि इस प्रोजेक्ट का शीर्षक और इसकी संभावित कहानी एक विशेष समुदाय की भावनाओं को ठेस पहुँचाने वाली है।

मंगलवार दोपहर तक इन हैशटैग के तहत 50,000 से अधिक पोस्ट दर्ज किए गए, जिनमें उपयोगकर्ताओं ने प्लेटफॉर्म के बहिष्कार और विवादास्पद प्रोजेक्ट को वापस लेने की मांग की। विवाद का मुख्य केंद्र “घूसखोर पंडित” (GhoosKhor Pandat) शीर्षक है, जिसे कई लोग ब्राह्मण समुदाय के खिलाफ एक अपमानजनक और रूढ़िवादी चित्रण मान रहे हैं।

आक्रोश की शुरुआत

बताया जा रहा है कि यह विवाद नेटफ्लिक्स इंडिया के बैनर तले एक नए प्रोजेक्ट के टीज़र या शीर्षक की घोषणा के बाद शुरू हुआ। हालांकि कहानी के बारे में अभी विस्तृत जानकारी सार्वजनिक नहीं की गई है, लेकिन इसके शीर्षक ने ही आलोचनाओं का दौर शुरू कर दिया। X पर उपयोगकर्ताओं ने आरोप लगाया कि यह शीर्षक “जानबूझकर उकसाने वाला” है और यह उन डिजिटल प्लेटफॉर्म्स की “सांस्कृतिक असंवेदनशीलता” को दर्शाता है जो अक्सर भारतीय मूल्यों के साथ खिलवाड़ करते हैं।

कई सत्यापित खातों और सामुदायिक समूहों ने इस विरोध में शामिल होते हुए कहा कि “पंडित” जैसे सम्मानित शब्द के साथ “घूसखोर” शब्द जोड़ना पूरे वर्ग की छवि खराब करने का प्रयास है। सोशल मीडिया पर अब इस प्रोजेक्ट पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने की मांग जोर पकड़ रही है।

जवाबदेही की मांग और नेटफ्लिक्स की चुप्पी

विरोध प्रदर्शन में विभिन्न प्रकार की प्रतिक्रियाएं देखने को मिलीं। कुछ उपयोगकर्ताओं ने स्पष्टीकरण की मांग की, तो कुछ ने सीधे नेटफ्लिक्स ऐप को डिलीट करने की अपील की। कई यूजर्स ने अपने ‘सब्सक्रिप्शन’ रद्द करने के स्क्रीनशॉट भी साझा किए।

दिल्ली स्थित डिजिटल मीडिया विश्लेषक रवि शर्मा ने कहा, “डिजिटल प्लेटफॉर्म्स को यह समझना चाहिए कि रचनात्मक स्वतंत्रता का अर्थ किसी समुदाय विशेष का अपमान करना नहीं है। भारत जैसे विविधतापूर्ण बाजार में, कंटेंट का नामकरण भी उतना ही संवेदनशील होता है जितना कि उसका कंटेंट। आज हम जो सामूहिक प्रतिक्रिया देख रहे हैं, वह उस दर्शक वर्ग की जागरूकता को दर्शाती है जो अपनी पहचान के प्रति सतर्क है।”

इस बढ़ते तनाव के बावजूद, नेटफ्लिक्स इंडिया ने अभी तक कोई आधिकारिक बयान जारी नहीं किया है। यह स्पष्ट नहीं है कि यह प्रोजेक्ट कोई फिल्म है या वेब सीरीज, या फिर यह शीर्षक केवल एक ‘वर्किंग टाइटल’ है।

कानूनी और नियामक संदर्भ

यह घटना ऐसे समय में हुई है जब भारत सरकार सूचना प्रौद्योगिकी (मध्यवर्ती दिशानिर्देश और डिजिटल मीडिया आचार संहिता) नियम के माध्यम से ओटीटी प्लेटफॉर्म्स पर निगरानी सख्त कर रही है। इन नियमों के तहत, प्लेटफॉर्म्स के लिए एक शिकायत निवारण तंत्र स्थापित करना अनिवार्य है ताकि धार्मिक या सांप्रदायिक भावनाओं को आहत करने वाली शिकायतों का निपटारा किया जा सके।

ऐतिहासिक रूप से, नेटफ्लिक्स और उसके प्रतिस्पर्धियों (अमेज़न प्राइम, डिज़नी+ हॉटस्टार) को भारत में कई कानूनी बाधाओं का सामना करना पड़ा है। तांडव और ए सूटेबल बॉय जैसे शो के दौरान हुए विवादों के बाद अब यह नया मामला ओटीटी कंटेंट की सीमाओं पर बहस को फिर से तेज कर रहा है।

विशेषज्ञ विश्लेषण: ट्रेंडिंग विमर्श की शक्ति

सोशल मीडिया विशेषज्ञों का सुझाव है कि इन हैशटैग का “ट्रेंड” होना एक दबाव समूह की तरह काम करता है। डिजिटल समाजशास्त्र की विशेषज्ञ डॉ. अंजली गुप्ता के अनुसार, “X पर कोई ट्रेंड अब केवल एक डिजिटल घटना नहीं रह गई है; इसके वास्तविक आर्थिक परिणाम होते हैं। जब नेटफ्लिक्स जैसा ब्रांड ‘Shame’ शब्द के साथ जुड़ता है, तो यह निवेशकों के विश्वास और ग्राहकों की संख्या को प्रभावित करता है। ये हैशटैग आधुनिक युग के ‘धरने’ हैं।”

नेटफ्लिक्स की ओर से त्वरित प्रतिक्रिया की कमी ने आग में घी डालने का काम किया है। कई उपयोगकर्ताओं ने इस चुप्पी को “अहंकार” करार दिया है। उद्योग के जानकारों का मानना है कि प्लेटफॉर्म औपचारिक स्पष्टीकरण देने या शीर्षक बदलने की घोषणा करने से पहले आंतरिक समीक्षा कर सकता है।

आगे का रास्ता

सोशल मीडिया पर यह उबाल तब तक शांत होने की संभावना नहीं है जब तक कि प्लेटफॉर्म की ओर से कोई ठोस कदम नहीं उठाया जाता। नेटफ्लिक्स के लिए चुनौती यह है कि वह रचनात्मक स्वतंत्रता और सामुदायिक संवेदनशीलता के बीच संतुलन कैसे बनाता है।

शमा एक उत्साही और संवेदनशील लेखिका हैं, जो समाज से जुड़ी घटनाओं, मानव सरोकारों और बदलते समय की सच्ची कहानियों को शब्दों में ढालती हैं। उनकी लेखन शैली सरल, प्रभावशाली और पाठकों के दिल तक पहुँचने वाली है। शमा का विश्वास है कि पत्रकारिता केवल खबरों का माध्यम नहीं, बल्कि विचारों और परिवर्तन की आवाज़ है। वे हर विषय को गहराई से समझती हैं और सटीक तथ्यों के साथ ऐसी प्रस्तुति देती हैं जो पाठकों को सोचने पर मजबूर कर दे। उन्होंने अपने लेखों में प्रशासन, शिक्षा, पर्यावरण, महिला सशक्तिकरण और सामाजिक बदलाव जैसे मुद्दों को विशेष रूप से उठाया है। उनके लेख न केवल सूचनात्मक होते हैं, बल्कि समाज में जागरूकता और सकारात्मक दृष्टिकोण विकसित करने की दिशा भी दिखाते हैं।

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