Geo-politics
पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना ने यूनुस पर साधा निशाना, वापसी के लिए रखी शर्त
भारत में निर्वासन (exile) में रह रहीं बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना ने बुधवार को देश के अंतरिम मुख्य सलाहकार, नोबेल पुरस्कार विजेता मोहम्मद यूनुस पर तीखा हमला बोला है। हसीना ने नई दिल्ली के प्रति यूनुस के हालिया आक्रामक रुख और बयानबाजी को “मूर्खतापूर्ण” और “आत्म-पराजय वाला” बताया। उन्होंने आगाह किया कि ऐसी नीतियों से आपसी विश्वास पर निर्मित दशकों की मजबूत द्विपक्षीय सद्भावना कमजोर होने का खतरा है।
प्रेस ट्रस्ट ऑफ इंडिया (PTI) से बात करते हुए, हसीना ने जोर देकर कहा कि ढाका और नई दिल्ली के बीच गहरे संबंधों को “यूनुस के मूर्खतापूर्ण हस्तक्षेप” का सामना करना पड़ेगा। उन्होंने यूनुस के नेतृत्व वाले मौजूदा अंतरिम शासन पर बांग्लादेश में “लोकतांत्रिक व्यवस्था को भंग करने” और “चरमपंथियों को सशक्त बनाने” का आरोप लगाया, और चेतावनी दी कि वर्तमान नेतृत्व के तहत देश का नाजुक राजनीतिक और सामाजिक ताना-बाना खतरे में है।
राजनीतिक बदलाव की पृष्ठभूमि
इस साल की शुरुआत में बांग्लादेश में राजनीतिक माहौल में नाटकीय बदलाव आया था। शेख हसीना को बड़े, निरंतर छात्र-नेतृत्व वाले विरोध प्रदर्शनों—जो शुरू में कोटा सुधारों पर केंद्रित थे—के बीच इस्तीफा देने और देश से भागने के लिए मजबूर होना पड़ा था। उनके सत्ता से हटने के बाद, डॉ. मोहम्मद यूनुस, जो माइक्रोफाइनेंस में अपने काम के लिए विश्व स्तर पर जाने जाते हैं, ने मुख्य सलाहकार की भूमिका संभाली, और भविष्य के लोकतांत्रिक चुनावों के लिए जमीन तैयार करने का काम कर रहे हैं।
हालांकि, सत्ता परिवर्तन के बाद से भारत और बांग्लादेश के संबंधों में महत्वपूर्ण तनाव देखा गया है। हसीना की अवामी लीग सरकार के तहत साझा सुरक्षा और कनेक्टिविटी लक्ष्यों के कारण जो पारंपरिक रूप से गर्मजोशी भरा संबंध फला-फूला था, वह ढाका से आने वाली भारत-विरोधी भावनाओं और भड़काऊ बयानों के कारण ठंडा पड़ गया है। इस राजनयिक टकराव ने हाल ही में भारत के रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह को यूनुस को सार्वजनिक रूप से चेतावनी जारी करने के लिए प्रेरित किया था, जिसमें उन्होंने बढ़ती बयानबाजी के बीच “अपने शब्दों पर ध्यान देने” का आग्रह किया था।
वापसी के लिए शर्त
राजनयिक दृष्टिकोण की आलोचना करने के अलावा, हसीना ने अपने बयान का उपयोग अपनी संभावित घर वापसी के लिए निश्चित शर्त को रेखांकित करने के लिए किया। उन्होंने दृढ़ता से कहा कि उनकी वापसी वर्तमान राजनीतिक स्थिति के उलटफेर और एक वास्तविक भागीदारी वाली प्रणाली की स्थापना पर निर्भर है।
उन्होंने पीटीआई को बताया, “बांग्लादेश लौटने के लिए मेरी प्रमुख शर्त भागीदारी वाली लोकतंत्र की बहाली है।” यह जोर अंतरिम सरकार के जनादेश और तरीकों के बारे में हसीना और उनकी पार्टी के गहरे संदेह को उजागर करता है, यह सुझाव देता है कि वर्तमान संरचना एक कार्यात्मक लोकतांत्रिक व्यवस्था के बुनियादी मानकों को पूरा करने में विफल है।
भू-राजनीतिक तनाव पर विशेषज्ञ राय
नई दिल्ली के लिए राजनयिक रस्साकशी तेजी से जटिल हो गई है क्योंकि यह अपने प्रमुख पड़ोसी की आंतरिक राजनीतिक गतिशीलता को नेविगेट करती है। विश्लेषकों का सुझाव है कि भारत को स्थिरता और द्विपक्षीय परियोजनाओं की निरंतरता के महत्व का संकेत देते हुए अंतरिम सेटअप के साथ संचार बनाए रखना चाहिए।
पूर्व भारतीय राजदूत और दक्षिण एशियाई सुरक्षा विशेषज्ञ, डॉ. स्मिता पुरुषोत्तम, ने बदलाव की जटिलता पर टिप्पणी की: “पिछले एक दशक में निर्मित भू-राजनीतिक वास्तुकला, विशेष रूप से सुरक्षा सहयोग और सीमा प्रबंधन के संबंध में, शेख हसीना के साथ स्थापित विश्वास पर बहुत अधिक निर्भर थी। एक अंतरिम प्रशासन में अचानक बदलाव जो भारत विरोधी भावनाओं को बढ़ने देता है, सक्रिय रूप से या निष्क्रिय रूप से, पड़ोस की कूटनीति पर महत्वपूर्ण दबाव डालता है। नई दिल्ली को धैर्यपूर्वक एक स्थिर, निर्वाचित सरकार की पुन: स्थापना की प्रतीक्षा करते हुए मुख्य सुरक्षा हितों पर दृढ़ता दिखानी होगी।”
हसीना का सार्वजनिक दावा बांग्लादेश की आंतरिक राजनीतिक बहस—विशेष रूप से लोकतंत्र की परिभाषा और कार्यान्वयन पर संघर्ष—को उसके अंतर्राष्ट्रीय संबंधों के केंद्र में रखता है, यह सुनिश्चित करता है कि पूर्व प्रधानमंत्री का भाग्य राष्ट्र के भविष्य के लोकतांत्रिक स्वास्थ्य से आंतरिक रूप से जुड़ा हुआ है।
