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International Relations

रणनीतिक सतर्कता: भारत को गाजा शांति बोर्ड से दूर रहने की सलाह

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SamacharToday.co.in - रणनीतिक सतर्कता भारत को गाजा शांति बोर्ड से दूर रहने की सलाह - Image Credited by Business Today

गाजा पट्टी की बहाली, राहत और शासन के लिए अमेरिका द्वारा गठित ‘बोर्ड ऑफ पीस’ (Board of Peace) में शामिल होने के निमंत्रण ने भारत के रणनीतिक हलकों में एक नई बहस छेड़ दी है। अमेरिका ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को इस उच्च स्तरीय बोर्ड का हिस्सा बनने के लिए औपचारिक निमंत्रण भेजा है। हालांकि, पूर्व विदेश सचिव कंवल सिब्बल सहित कई अनुभवी राजनयिकों ने सरकार को इस प्रस्ताव को विनम्रतापूर्वक अस्वीकार करने की सलाह दी है।

यह बोर्ड अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की एक महत्वाकांक्षी पहल है, जिसका उद्देश्य युद्धग्रस्त गाजा के पुनर्निर्माण के लिए एक बहुपक्षीय ढांचा तैयार करना है। भारत में अमेरिकी राजदूत सर्जियो गोर ने पुष्टि की कि उन्होंने यह निमंत्रण प्रधानमंत्री मोदी तक पहुँचाया है। लेकिन इस बोर्ड की संरचना, जिसमें राजनयिकों के साथ-साथ निजी व्यवसायियों को भी शामिल किया गया है, इसकी निष्पक्षता पर सवाल खड़े कर रही है।

“नो, थैंक यू” का सिद्धांत

भारत के सबसे सम्मानित राजनयिकों में से एक, कंवल सिब्बल ने सोशल मीडिया और सार्वजनिक मंचों पर अपनी चिंताएं व्यक्त की हैं। उन्होंने तर्क दिया कि गाजा का मुद्दा मूल रूप से एक अरब मुद्दा है, और भारत को एक ऐसी व्यवस्था का हिस्सा नहीं बनना चाहिए जो संयुक्त राष्ट्र की मंजूरी के बिना और निजी हितों से प्रेरित होकर बनाई गई है।

सिब्बल ने कहा, “यदि यह रिपोर्ट सही है, तो उत्तर ‘नो थैंक यू’ (नहीं, धन्यवाद) होना चाहिए। भारत को ऐसी व्यवस्था का हिस्सा नहीं होना चाहिए जो बिना किसी संयुक्त राष्ट्र की स्वीकृति के मनमाने ढंग से स्थापित की गई हो, जो संभावित कठिनाइयों से भरी हो और जिसकी संरचना में निजी पक्षों के व्यावसायिक हित जुड़े हों। अरब देशों को ही मुख्य रूप से इस अत्यंत जटिल अरब मुद्दे को संभालने देना चाहिए।”

बोर्ड ऑफ पीस: संरचना और सदस्यता शुल्क

यह बोर्ड अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की अध्यक्षता में कार्य करेगा। इसमें शामिल होने वाले व्यक्तियों की सूची कूटनीति और व्यापार का एक अनूठा मिश्रण है।

मुख्य नेतृत्व और पैनल: इसमें अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो, विशेष वार्ताकार स्टीव विटकॉफ और ट्रंप के दामाद जेरेड कुशनर शामिल हैं। इसके अलावा, ब्रिटेन के पूर्व प्रधानमंत्री टोनी ब्लेयर, विश्व बैंक के अध्यक्ष अजय बंगा और अमेरिकी अरबपति मार्क रोवन भी इस पैनल का हिस्सा हैं।

कार्यकारी बोर्ड: कार्यकारी बोर्ड में तुर्की के विदेश मंत्री हाकान फिदान, मिस्र की खुफिया एजेंसी के प्रमुख जनरल हसन रशाद और इजरायली अरबपति याकिर गैबे जैसे नाम शामिल हैं।

सबसे चौंकाने वाला पहलू इस बोर्ड की सदस्यता की शर्तें हैं। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, बोर्ड की स्थायी सदस्यता के लिए 1 बिलियन डॉलर (लगभग 8,400 करोड़ रुपये) का योगदान देना अनिवार्य है। तीन साल की छोटी नियुक्तियों के लिए वित्तीय निवेश की आवश्यकता नहीं है, लेकिन पुनर्निर्माण के निर्णयों में उनका प्रभाव सीमित रहेगा।

आमंत्रित देशों की सूची

अमेरिका ने इस बोर्ड के लिए दुनिया भर के प्रभावशाली नेताओं को आमंत्रित किया है, जिनमें पाकिस्तान के पीएम शहबाज शरीफ, तुर्की के राष्ट्रपति रेसेप तैयप एर्दोगन, इटली की पीएम जियोर्जिया मेलोनी और मिस्र के राष्ट्रपति अब्देल फत्ताह अल-सीसी शामिल हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि भारत को आमंत्रित करना नई दिल्ली की बढ़ती ‘विश्व बंधु’ छवि का प्रमाण है। हालांकि, भारत के लिए दुविधा यह है कि क्या इस तरह की भागीदारी उसकी ‘दो-राष्ट्र समाधान’ (Two-State Solution) की पारंपरिक नीति और इजरायल व अरब जगत के बीच उसके नाजुक संतुलन के अनुकूल है।

विशेषज्ञों की राय: भारत क्यों झिझक रहा है?

कूटनीतिक शांति बोर्ड के भीतर निजी व्यावसायिक हितों की उपस्थिति भारत के लिए एक बड़ी चेतावनी है। ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन (ORF) के उपाध्यक्ष डॉ. हर्ष वी. पंत का कहना है:

“मध्य पूर्व में भारत की उपस्थिति I2U2 और IMEC कॉरिडोर के माध्यम से काफी बढ़ी है। हालांकि, किसी एक महाशक्ति के नेतृत्व वाले गाजा-विशिष्ट शासन बोर्ड में शामिल होना भारत को क्षेत्र की राजनीतिक और सांप्रदायिक लड़ाई में फंसा सकता है। नई दिल्ली मानवीय सहायता और अंतरराष्ट्रीय प्रोटोकॉल के माध्यम से विकास पर ध्यान केंद्रित करना पसंद करती है।”

इसके अलावा, संयुक्त राष्ट्र के औपचारिक जनादेश (Mandate) की कमी भारत की भागीदारी को वैश्विक स्तर पर कानूनी रूप से कमजोर बना सकती है।

रणनीतिक स्वायत्तता का सवाल

प्रधानमंत्री कार्यालय वर्तमान में इस निमंत्रण का मूल्यांकन कर रहा है। भारत के सामने विकल्प एक हाई-प्रोफाइल टेबल पर सीट पाने की प्रतिष्ठा और एक अस्थिर मिशन के जोखिमों के बीच है। जहां अमेरिका भारत को एक स्थिर शक्ति के रूप में देखता है, वहीं घरेलू स्तर पर कंवल सिब्बल जैसे दिग्गजों का मानना है कि भारत के हित अपनी रणनीतिक स्वायत्तता बनाए रखने में ही निहित हैं।

यदि भारत शामिल होता है, तो यह मध्य पूर्व की शांति प्रक्रिया में एक ऐतिहासिक बदलाव होगा; यदि वह मना करता है, तो यह “दूसरे के युद्धों” से दूर रहने की अपनी पुरानी नीति की पुष्टि होगी।

देवाशीष पेशे से इंजीनियर हैं और वर्ष 2017 से मीडिया क्षेत्र में सक्रिय हैं। उन्हें 2017 से पत्रकारिता में निरंतर अनुभव प्राप्त है, जिसके आधार पर उन्होंने डिजिटल और समाचार जगत में अपनी एक मजबूत पहचान बनाई है। उन्हें राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक विषयों पर गहरी समझ और विश्लेषणात्मक दृष्टि के लिए जाना जाता है। भारतीय जनता पार्टी (BJP), संसद, केंद्र सरकार और नीति-निर्माण से जुड़े मामलों पर उनकी पैनी नज़र रहती है। उनकी मुख्य रुचि और विशेषज्ञता अंतरराष्ट्रीय समाचारों, प्रबंधन, व्यापार (बिज़नेस) और खेल जगत की कवरेज में रही है। इसके साथ ही वे सीमित रूप से राजनीति और न्यूज़ प्लेसमेंट से जुड़े विषयों को भी कवर करते हैं। Samachar Today में देवाशीष का फोकस वैश्विक घटनाक्रम, आर्थिक गतिविधियों, खेल समाचारों और रणनीतिक विषयों पर निष्पक्ष, तथ्य-आधारित और संतुलित रिपोर्टिंग प्रदान करना है।

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