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सुहाना खान ने शाहरुख और गौरी की भूमिका पर की चर्चा

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SamacharToday.co.in - सुहाना खान ने शाहरुख और गौरी की भूमिका पर की चर्चा - Image Credited by MoneyControl

मुंबई — आज के दौर में जहां स्वायत्तता और स्वतंत्रता को वयस्कता का सबसे बड़ा पैमाना माना जाता है, वहीं बॉलीवुड के बादशाह शाहरुख खान और प्रसिद्ध डिजाइनर गौरी खान की बेटी सुहाना खान ने पारिवारिक रिश्तों पर एक अलग और स्पष्ट दृष्टिकोण साझा किया है। हार्पर बाजार इंडिया को दिए गए एक हालिया साक्षात्कार में, 25 वर्षीय अभिनेत्री ने खुलासा किया कि उनके करियर के बढ़ते ग्राफ और सार्वजनिक पहचान के बावजूद, उनके जीवन के महत्वपूर्ण फैसलों में अंतिम निर्णय उनके माता-पिता का ही होता है।

सुहाना ने स्वीकार किया, “मुझे अपने माता-पिता से पूछना पड़ता है। अंतिम निर्णय उन्हीं का होता है।” यह बयान दर्शाता है कि खान परिवार में आज भी पारंपरिक मूल्यों का पालन होता है, जहां अगली पीढ़ी बड़े मंच पर कदम रखने से पहले घर के बड़ों की सलाह को सर्वोपरि मानती है।

सहज ज्ञान, तर्क और सलाह की शक्ति

सुहाना का मनोरंजन जगत में प्रवेश काफी संयमित और सावधानी भरा रहा है। हालांकि वह “नए प्रयोग करने और वैकल्पिक रास्तों को तलाशने” की इच्छुक हैं, लेकिन वह खुद को एक ‘ओवरथिंकर’ (अत्यधिक सोचने वाली) बताती हैं। उनके निर्णय लेने की प्रक्रिया आमतौर पर उनके “सहज ज्ञान” (instinct) से शुरू होती है, जिसके बाद वह तार्किक रूप से विकल्पों को तौलती हैं, और अंत में ‘मन्नत’ में होने वाली चर्चा पर निर्भर करती हैं।

उन्होंने अपने दोनों माता-पिता से मिलने वाली सलाह के अलग-अलग अंदाज़ का विवरण दिया। सुहाना के अनुसार, उनके पिता शाहरुख खान उन्हें “विस्तृत और काव्यात्मक” (poetic) सलाह देते हैं। उनके विचार अक्सर दार्शनिक होते हैं, जो जीवन और फिल्म उद्योग को देखने का एक व्यापक नज़रिया प्रदान करते हैं। इसके विपरीत, गौरी खान “स्पष्टता” की प्रतिमूर्ति हैं। सुहाना बताती हैं कि उनकी मां की बातें सीधी और व्यावहारिक होती हैं, जो उन्हें भ्रम से बाहर निकालने में मदद करती हैं।

सुहाना ने समझाया, “उन दोनों के बीच, मैं अपना संतुलन ढूंढ लेती हूं।” यह संतुलन बॉलीवुड के अत्यधिक दबाव वाले माहौल में उनके लिए एक आधार (anchor) बन गया है।

‘द आर्चीज़’ से ‘किंग’ तक: बढ़ती विरासत

सुहाना ने 2023 में ज़ोया अख्तर की फिल्म द आर्चीज़ के साथ अभिनय की दुनिया में कदम रखा था। वेरोनिका लॉज की भूमिका निभाते हुए, वह एक ऐसे समूह का हिस्सा थीं जिसमें अगस्त्य नंदा और खुशी कपूर जैसे अन्य ‘स्टार किड्स’ भी शामिल थे। फिल्म को मिली-जुली समीक्षाएं मिलीं, लेकिन सुहाना के आत्मविश्वास और स्क्रीन प्रेजेंस की काफी तारीफ हुई।

हालांकि, अभिनय की ओर उनका रुझान हमेशा से इतना मजबूत नहीं था। उन्होंने साझा किया कि उनके बोर्डिंग स्कूल के दिनों में मिली एक असफलता ने उनके भीतर अभिनय की चिंगारी जगाई। एक नाटक में मुख्य भूमिका न मिलने और ‘कोरस’ का हिस्सा बनने पर वह अपने कमरे में रोई थीं। उन्होंने याद करते हुए कहा, “शायद तभी मुझे एहसास हुआ कि मैं वास्तव में वे भूमिकाएं निभाना चाहती हूं और मंच पर रहने के रोमांच का आनंद लेना चाहती हूं।”

अब, सुहाना सिद्धार्थ आनंद द्वारा निर्देशित आगामी एक्शन-थ्रिलर किंग के साथ बड़े पर्दे पर अपनी शुरुआत करने की तैयारी कर रही हैं। यह फिल्म भारत की सबसे महंगी एक्शन फिल्मों में से एक मानी जा रही है, जिसका बजट लगभग ₹350 करोड़ है। सबसे खास बात यह है कि वह अपने पिता के साथ स्क्रीन साझा करेंगी, जो उन्हें एक्शन और स्टंट के लिए व्यक्तिगत रूप से प्रशिक्षण दे रहे हैं।

विशेषज्ञ की राय: ‘स्टार-पैरेंट’ की भूमिका

यह खुलासा कि शाहरुख और गौरी अब भी सुहाना के फैसलों में “अंतिम निर्णय” लेते हैं, ने सांस्कृतिक विशेषज्ञों के बीच एक नई चर्चा छेड़ दी है। सेलिब्रिटी जगत में, जहां सार्वजनिक छवि किसी का करियर बना या बिगाड़ सकती है, परिवार के भीतर अनुभवी सलाहकारों का होना एक बड़ी ताकत माना जाता है।

रेज़िंग स्टार्स: द चैलेंजेस एंड जॉयज़ ऑफ़ बीइंग अ बॉलीवुड पैरेंट की लेखिका रश्मि उचिल कहती हैं:

“प्रसिद्धि के बीच बच्चों की परवरिश करना किसी चुनौती से कम नहीं है। सुपरस्टार्स के बच्चों से उम्मीद की जाती है कि वे पहले दिन से ही परिपूर्ण हों। जब सुहाना कहती हैं कि उनके माता-पिता का निर्णय अंतिम होता है, तो वह केवल अधिकार की बात नहीं कर रही हैं; वह एक सुरक्षा घेरे की बात कर रही हैं। बॉलीवुड जैसे अस्थिर उद्योग में, माता-पिता का यह मार्गदर्शन ही इन युवा कलाकारों को ज़मीन से जुड़े रहने में मदद करता है।”

वर्तमान में जीना

जैसे-जैसे 2026 में फिल्म किंग की रिलीज नज़दीक आ रही है, सुहाना खान पर सबकी निगाहें और भी टिक जाएंगी। फिर भी, वह “एक समय में एक पल” जीने के सिद्धांत पर अडिग हैं। अपने पिता की दार्शनिक गहराई और अपनी माँ की व्यावहारिक स्पष्टता के बीच संतुलन बनाकर, वह एक ऐसा रास्ता बना रही हैं जो उनका अपना है। सुहाना के लिए, उनके माता-पिता केवल उनके अभिभावक नहीं हैं; वे इस दुनिया में उनके सबसे भरोसेमंद साथी हैं।

शमा एक उत्साही और संवेदनशील लेखिका हैं, जो समाज से जुड़ी घटनाओं, मानव सरोकारों और बदलते समय की सच्ची कहानियों को शब्दों में ढालती हैं। उनकी लेखन शैली सरल, प्रभावशाली और पाठकों के दिल तक पहुँचने वाली है। शमा का विश्वास है कि पत्रकारिता केवल खबरों का माध्यम नहीं, बल्कि विचारों और परिवर्तन की आवाज़ है। वे हर विषय को गहराई से समझती हैं और सटीक तथ्यों के साथ ऐसी प्रस्तुति देती हैं जो पाठकों को सोचने पर मजबूर कर दे। उन्होंने अपने लेखों में प्रशासन, शिक्षा, पर्यावरण, महिला सशक्तिकरण और सामाजिक बदलाव जैसे मुद्दों को विशेष रूप से उठाया है। उनके लेख न केवल सूचनात्मक होते हैं, बल्कि समाज में जागरूकता और सकारात्मक दृष्टिकोण विकसित करने की दिशा भी दिखाते हैं।

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