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धुरंधर फिल्म विवाद: ध्रुव राठी के प्रोपेगेंडा आरोपों पर नवीन कौशिक का पलटवार

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SamacharToday.co.in - धुरंधर फिल्म विवाद ध्रुव राठी के प्रोपेगेंडा आरोपों पर नवीन कौशिक का पलटवार - Image Credited by The Daily Jagran

आदित्य धर की नवीनतम जासूसी थ्रिलर, ‘धुरंधर’, बॉक्स-ऑफिस पर भारी सफलता के बाद अब सिनेमा और दुष्प्रचार (प्रोपेगेंडा) के बीच के संबंधों पर एक तीखी राष्ट्रीय बहस का केंद्र बन गई है। जहां एक तरफ फिल्म ने घरेलू स्तर पर अनुमानित ₹589.50 करोड़ की कमाई के साथ रिकॉर्ड तोड़ना जारी रखा है, वहीं दूसरी ओर यह प्रसिद्ध यूट्यूबर और राजनीतिक विश्लेषक ध्रुव राठी के निशाने पर आ गई है। इस टकराव के बीच फिल्म के कलाकार नवीन कौशिक ने राठी पर पलटवार करते हुए सुझाव दिया है कि “प्रोपेगेंडा” के लेबल का इस्तेमाल डिजिटल व्यूज बटोरने के लिए किया जा रहा है।

विवाद की शुरुआत: ‘धुरंधर की वास्तविकता’

विवाद शनिवार को तब भड़का जब ध्रुव राठी ने “रियलिटी ऑफ धुरंधर” शीर्षक से एक तीखा वीडियो जारी किया। इस वीडियो में राठी ने फिल्म को “झूठ पर आधारित खतरनाक प्रोपेगेंडा” करार दिया। उनकी मुख्य शिकायत फिल्म की मार्केटिंग रणनीति से है, जो इसे वास्तविक घटनाओं से प्रेरित होने का दावा करती है।

राठी ने तर्क दिया कि 26/11 के मुंबई आतंकी हमलों के वास्तविक फुटेज और आतंकवादियों के हैंडलर्स की असली ऑडियो रिकॉर्डिंग का उपयोग करके, फिल्म कल्पना और इतिहास के बीच की रेखा को इस तरह धुंधला करती है कि जनता गुमराह हो जाती है। ‘पठान’ या ‘टाइगर’ जैसी काल्पनिक जासूसी फिल्मों के विपरीत, राठी का दावा है कि ‘धुरंधर’ पाकिस्तान के ल्यारी स्थित गैंगस्टरों पर आधारित पात्रों और यथार्थवादी परिवेश का उपयोग करके एक ऐसे नैरेटिव को विश्वसनीयता प्रदान करती है जिसे उन्होंने “झूठा और वाहियात” कहा है।

राठी ने अपनी आलोचना में कहा, “खतरा फिल्म के निर्माण कौशल में है। एक अच्छी तरह से बनाई गई प्रोपेगेंडा फिल्म खराब बनी फिल्म की तुलना में असीम रूप से अधिक हानिकारक होती है क्योंकि यह पक्षपात को वस्तुनिष्ठ सत्य के रूप में पेश करती है।”

इंडस्ट्री का पलटवार

‘धुरंधर’ की टीम की ओर से प्रतिक्रिया आने में देरी नहीं हुई। फिल्म में ‘दोंगा’ के किरदार से लोकप्रियता हासिल करने वाले अभिनेता नवीन कौशिक ने एक मीडिया बातचीत के दौरान राठी के आरोपों को खारिज कर दिया। कौशिक का स्वर आक्रोश के बजाय उपेक्षापूर्ण था।

नवीन कौशिक ने टिप्पणी की, “वह अपनी राय रखने वाले व्यक्ति हैं। मैं फिल्म से जुड़ा हूं, इसलिए जाहिर है कि मैं उनसे सहमत नहीं हूं। अंत में, उन्हें हमारी वजह से कुछ व्यूज मिल गए, तो उन्हें बधाई।” कौशिक का यह बयान फिल्म जगत की उस व्यापक धारणा को दर्शाता है कि डिजिटल टिप्पणीकार अक्सर अपनी पहुंच बढ़ाने के लिए बड़े बजट की फिल्मों के विवादों का सहारा लेते हैं। इससे पहले अभिनेत्री देवोलीना भट्टाचार्य ने भी सोशल मीडिया पर राठी की आलोचना करते हुए उन्हें फिल्म के बारे में “बात करना बंद करने” की सलाह दी थी।

विशेषज्ञ विश्लेषण: आधुनिक भारतीय सिनेमा का संदर्भ

‘धुरंधर’ को लेकर छिड़ी यह बहस कोई इकलौती घटना नहीं है, बल्कि यह पिछले एक दशक में भारतीय सिनेमा के “न्यू एज पैट्रियोटिज्म” (नए युग का राष्ट्रवाद) की ओर झुकाव का हिस्सा है। आदित्य धर की पहली फिल्म ‘उरी: द सर्जिकल स्ट्राइक’ (2019) की भारी सफलता के बाद से, भारतीय दर्शकों ने राष्ट्रीय सुरक्षा और खुफिया अभियानों पर आधारित फिल्मों के प्रति गहरी रुचि दिखाई है।

अनुभवी फिल्म विश्लेषक और व्यापार विशेषज्ञ रमेश बाला ने इस विवाद पर अपनी राय देते हुए कहा: “हम फिल्म आलोचना का लोकतंत्रीकरण देख रहे हैं जहां यूट्यूबर्स का प्रभाव पारंपरिक आलोचकों के बराबर है। हालांकि, ‘प्रोपेगेंडा’ का लेबल अक्सर व्यक्तिगत होता है। जिसे एक व्यक्ति प्रोपेगेंडा कहता है, दूसरा उसे अनसुने नायकों को श्रद्धांजलि कह सकता है। ‘धुरंधर’ जैसी फिल्म का ₹600 करोड़ के करीब पहुंचना यह साबित करता है कि यह राजनीतिक विचारधारा से परे आम जनता के साथ जुड़ी है। कहानी कहने का तरीका और फिल्म का पैमाना ही इन आंकड़ों को चला रहा है।”

सितारों से सजी एक बड़ी फिल्म

5 दिसंबर को रिलीज हुई ‘धुरंधर’ में रणवीर सिंह, अक्षय खन्ना, आर. माधवन, संजय दत्त और अर्जुन रामपाल जैसे दिग्गज कलाकार शामिल हैं। फिल्म की तकनीकी कुशलता—विशेष रूप से इसका यथार्थवाद और एक्शन—को पारंपरिक फिल्म आलोचकों द्वारा भी सराहा गया है, भले ही उन्होंने इसके मजबूत राष्ट्रवादी स्वर पर गौर किया हो।

फिल्म की आर्थिक सफलता ने इसे नकारात्मक डिजिटल टिप्पणियों के प्रभाव से प्रभावी रूप से बचा लिया है। वास्तव में, निर्माताओं ने इसके सीक्वल की आधिकारिक घोषणा कर दी है, जो 19 मार्च, 2026 को सिनेमाघरों में रिलीज होने वाली है।

निष्कर्ष

जैसे-जैसे ‘धुरंधर’ अपने चौथे सप्ताह में प्रवेश कर रही है, वैचारिक विभाजन स्पष्ट है। राठी जैसे आलोचकों के लिए, यह फिल्म विशिष्ट राजनीतिक नैरेटिव को मजबूत करने के लिए सिनेमा के उपयोग की एक चिंताजनक प्रवृत्ति है। वहीं रचनाकारों और करोड़ों प्रशंसकों के लिए, यह एक उच्च गुणवत्ता वाली थ्रिलर है जो भारतीय खुफिया तंत्र की भावना का सम्मान करती है। ‘प्रोपेगेंडा’ की बहस पर किसी की जो भी राय हो, फिल्म की जबरदस्त कमाई यह साबित करती है कि आदित्य धर ने एक बार फिर भारतीय फिल्म प्रेमियों की नब्ज को सफलतापूर्वक पकड़ लिया है।

शमा एक उत्साही और संवेदनशील लेखिका हैं, जो समाज से जुड़ी घटनाओं, मानव सरोकारों और बदलते समय की सच्ची कहानियों को शब्दों में ढालती हैं। उनकी लेखन शैली सरल, प्रभावशाली और पाठकों के दिल तक पहुँचने वाली है। शमा का विश्वास है कि पत्रकारिता केवल खबरों का माध्यम नहीं, बल्कि विचारों और परिवर्तन की आवाज़ है। वे हर विषय को गहराई से समझती हैं और सटीक तथ्यों के साथ ऐसी प्रस्तुति देती हैं जो पाठकों को सोचने पर मजबूर कर दे। उन्होंने अपने लेखों में प्रशासन, शिक्षा, पर्यावरण, महिला सशक्तिकरण और सामाजिक बदलाव जैसे मुद्दों को विशेष रूप से उठाया है। उनके लेख न केवल सूचनात्मक होते हैं, बल्कि समाज में जागरूकता और सकारात्मक दृष्टिकोण विकसित करने की दिशा भी दिखाते हैं।

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