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यूरोप का विरोधाभास: नौकरी की रिकॉर्ड आशा, काम में सबसे कम मन

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यूरोप का विरोधाभास नौकरी की रिकॉर्ड आशा, काम में सबसे कम मन - SamacharToday.co.in

दुनिया के सबसे विकसित महाद्वीप यूरोप से एक ऐसी रिपोर्ट सामने आई है जिसने आधुनिक कार्य-संस्कृति के बुनियादी सिद्धांतों पर सवाल खड़े कर दिए हैं। ‘गैलप’ (Gallup) की ताज़ा रिपोर्ट ‘स्टेट ऑफ द ग्लोबल वर्कप्लेस: 2026’ के अनुसार, यूरोपीय कर्मचारी एक अजीबोगरीब मानसिक विरोधाभास के बीच जी रहे हैं। एक तरफ वे पिछले 15 वर्षों में नई नौकरी मिलने की संभावनाओं को लेकर सबसे अधिक आशावादी हैं, तो दूसरी तरफ वे काम में मन लगाने (Engagement) के मामले में दुनिया में सबसे निचले पायदान पर हैं।

यह विरोधाभास दर्शाता है कि केवल बेहतर वेतन और सुविधाएं किसी कर्मचारी को उसके काम के प्रति समर्पित बनाने के लिए पर्याप्त नहीं हैं।

बाहरी आशावाद का रिकॉर्ड उछाल

गैलप की रिपोर्ट के चौंकाने वाले आंकड़े बताते हैं कि 57% यूरोपीय कर्मचारी मानते हैं कि वर्तमान समय नई नौकरी खोजने के लिए “बेहतरीन” है। 2011 के यूरोज़ोन संकट के समय यह आंकड़ा मात्र 17% के आसपास था, यानी 15 सालों में इसमें 40 अंकों की भारी बढ़त हुई है। नीदरलैंड्स जैसे देशों में तो 86% कर्मचारी अपनी करियर गतिशीलता (Career Mobility) को लेकर आश्वस्त हैं।

बाज़ार विश्लेषकों का मानना है कि श्रम बाज़ार में कर्मचारियों की कमी और महामारी के बाद बदली परिस्थितियों ने कर्मचारियों को यह आत्मविश्वास दिया है। लेकिन, विडंबना यह है कि जैसे ही ये कर्मचारी अपने वर्तमान दफ्तर में प्रवेश करते हैं, उनका यह उत्साह ठंडे बस्ते में चला जाता है।

“एन्गेजमेंट संकट”: दुनिया में सबसे पीछे यूरोप

गैलप की रिपोर्ट का सबसे चिंताजनक हिस्सा यह है कि यूरोप में केवल 12% कर्मचारी ही अपने काम में पूरी तरह “एन्गेज्ड” (Engaged) हैं—यानी वे कर्मचारी जो अपने काम के प्रति भावनात्मक और मानसिक रूप से जुड़े हुए हैं और कंपनी की प्रगति में सक्रिय योगदान देते हैं। यह वैश्विक औसत (23%) से लगभग आधा है।

इससे भी अधिक डरावना तथ्य यह है कि यूरोप दुनिया के उन दो क्षेत्रों में से एक है (दूसरा मध्य-पूर्व और उत्तरी अफ्रीका है) जहाँ “सक्रिय रूप से विमुख” (Actively Disengaged) कर्मचारियों की संख्या (15%), समर्पित कर्मचारियों (12%) से अधिक है। ये वे कर्मचारी हैं जो न केवल काम नहीं करते, बल्कि कार्यस्थल पर नकारात्मकता भी फैलाते हैं। यूरोप में “क्वाइट क्विटिंग” (Quiet Quitting)—यानी केवल उतना ही काम करना जिससे नौकरी बची रहे—अब एक महामारी का रूप ले चुका है।

प्रमुख देशों की स्थिति: जर्मनी और ब्रिटेन पर संकट

यूरोप की दो सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में स्थिति सबसे गंभीर है:

  • जर्मनी: यूरोप के पावरहाउस कहे जाने वाले जर्मनी में कर्मचारी जुड़ाव 12% के ऐतिहासिक निचले स्तर पर आ गया है। इसके अलावा, 19% जर्मन कर्मचारी इस डर में जी रहे हैं कि अगले पांच वर्षों में कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) उनकी नौकरी छीन लेगी।

  • ब्रिटेन (UK): ब्रिटेन में स्थिति और भी खराब है, जहाँ केवल 10% कर्मचारी ही अपने काम में मन लगा रहे हैं। एक अनुमान के अनुसार, इस “अरुचि” के कारण ब्रिटेन को हर साल लगभग £257 बिलियन का उत्पादकता नुकसान हो रहा है।

संकट की जड़: “मैनेजर डेवलपमेंट गैप”

अर्थशास्त्रियों और मानव संसाधन विशेषज्ञों ने इस समस्या की मुख्य जड़ “मैनेजर डेवलपमेंट गैप” को बताया है। गैलप के आंकड़ों के अनुसार, 2024 से 2025 के बीच दुनिया भर में प्रबंधकों (Managers) का अपना उत्साह 27% से गिरकर 22% रह गया है।

गैलप के वर्कप्लेस मैनेजमेंट के मुख्य वैज्ञानिक जिम हार्तर कहते हैं, “कंपनियां अक्सर लोगों को उनके तकनीकी कौशल के आधार पर मैनेजर बना देती हैं, न कि उनके नेतृत्व कौशल के आधार पर। जब मैनेजर खुद थके हुए, अकेले और नेतृत्व के औपचारिक प्रशिक्षण से वंचित होते हैं—जो वर्तमान में केवल 44% को ही मिलता है—तो वे अपनी टीम को प्रेरित नहीं कर पाते। यह एक ऐसा चक्र है जहाँ थके हुए लीडर थकी हुई टीमें पैदा कर रहे हैं।”

10 ट्रिलियन डॉलर का वैश्विक झटका

कर्मचारियों का काम में मन न लगना केवल एक एचआर (HR) समस्या नहीं है, बल्कि यह एक बहुत बड़ा आर्थिक संकट भी है। गैलप का अनुमान है कि कर्मचारियों की अरुचि और कम उत्पादकता के कारण वैश्विक अर्थव्यवस्था को हर साल लगभग $10 ट्रिलियन (10 लाख करोड़ डॉलर) का नुकसान होता है। यह वैश्विक जीडीपी (GDP) का लगभग 9% है। यूरोप जैसे महाद्वीप के लिए, जो पहले से ही वृद्ध होती आबादी और वैश्विक प्रतिस्पर्धा से जूझ रहा है, यह उत्पादकता की कमी विकास की राह में बड़ा रोड़ा है।

कार्यस्थल जुड़ाव का विकास

‘कर्मचारी जुड़ाव’ (Employee Engagement) की अवधारणा 1990 के दशक में लोकप्रिय हुई थी। यह मापता है कि एक कर्मचारी अपने काम से कितना भावनात्मक और बौद्धिक रूप से जुड़ा है। पिछले एक दशक में, यूरोप लगातार उत्तरी अमेरिका और दक्षिण एशिया से पीछे रहा है। हालांकि यूरोप में सामाजिक सुरक्षा, कम काम के घंटे और लंबी छुट्टियां जैसे लाभ मिलते हैं, लेकिन ये “हाइजीन फैक्टर्स” प्रेरणा में नहीं बदल पा रहे हैं। नतीजा यह है कि कर्मचारियों के पास नौकरी की सुरक्षा तो है, लेकिन उद्देश्य (Purpose) की कमी है।

बॉस नहीं, कोच बनें

रिपोर्ट पूरी तरह निराशाजनक नहीं है। इसमें कहा गया है कि वे कंपनियां जो अपने कर्मचारियों के व्यक्तिगत विकास और “उद्देश्यपूर्ण नेतृत्व” (Purposeful Leadership) को प्राथमिकता देती हैं, वहाँ जुड़ाव का स्तर 79% तक देखा गया है। समाधान सरल है—मैनेजर की भूमिका को एक “बॉस” से बदलकर एक “कोच” में बदलना होगा।

अनूप शुक्ला पिछले तीन वर्षों से समाचार लेखन और ब्लॉगिंग के क्षेत्र में सक्रिय हैं। वे मुख्य रूप से समसामयिक घटनाओं, स्थानीय मुद्दों और जनता से जुड़ी खबरों पर गहराई से लिखते हैं। उनकी लेखन शैली सरल, तथ्यपरक और पाठकों से जुड़ाव बनाने वाली है। अनूप का मानना है कि समाचार केवल सूचना नहीं, बल्कि समाज में सकारात्मक सोच और जागरूकता फैलाने का माध्यम है। यही वजह है कि वे हर विषय को निष्पक्ष दृष्टिकोण से समझते हैं और सटीक तथ्यों के साथ प्रस्तुत करते हैं। उन्होंने अपने लेखों के माध्यम से स्थानीय प्रशासन, शिक्षा, रोजगार, पर्यावरण और जनसमस्याओं जैसे कई विषयों पर प्रकाश डाला है। उनके लेख न सिर्फ घटनाओं की जानकारी देते हैं, बल्कि उन पर विचार और समाधान की दिशा भी सुझाते हैं। समाचार टुडे में अनूप कुमार की भूमिका है — स्थानीय और क्षेत्रीय समाचारों का विश्लेषण ताज़ा घटनाओं पर रचनात्मक रिपोर्टिंग जनसरोकार से जुड़े विषयों पर लेखन रुचियाँ: लेखन, यात्रा, फोटोग्राफी और सामाजिक मुद्दों पर चर्चा।

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