डिजिटल दीवार: भारत में अब इंसानों से बात करना असंभव क्यों लग रहा है?

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भारत की तीव्र डिजिटल क्रांति, जो कभी अपनी सहज यूपीआई (UPI) लेनदेन और क्विक-कॉमर्स की सफलता के लिए दुनिया भर में मिसाल मानी जाती थी, अब एक बड़ी बाधा से टकरा रही है: “डिजिटल दीवार”। जैसे-जैसे आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) ग्राहक सेवा का प्राथमिक द्वारपाल बनता जा रहा है, करोड़ों भारतीय खुद को स्वचालित “डूम लूप” (अनंत चक्र) में फंसा हुआ पा रहे हैं।

यद्यपि ‘आर्थिक सर्वेक्षण 2024-25’ में एआई की सराहना की गई थी, लेकिन ज़मीनी हकीकत काफी निराशाजनक है। हालिया आंकड़ों के अनुसार, भारतीय उपभोक्ताओं ने 2024 में शिकायतों को सुलझाने और डिजिटल बाधाओं से निपटने में अनुमानित 15 अरब घंटे बर्बाद किए।

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‘कंटेनमेंट’ (रोकथाम) का जुनून

इंसानी बातचीत से दूरी का मुख्य कारण “कंटेनमेंट रेट” नामक एक मीट्रिक है। यह उन कॉल्स या संदेशों का प्रतिशत मापता है जो किसी मानवीय एजेंट तक पहुंचे बिना एआई (चैटबॉट या आईवीआर) के भीतर ही समाप्त हो जाते हैं।

तकनीकी विशेषज्ञों का कहना है कि कंपनियां ‘रोकथाम’ को ‘समाधान’ समझ बैठी हैं। यदि कोई ग्राहक आईवीआर मेनू से परेशान होकर फोन काट देता है, तो सिस्टम उसे एक सफल रोकथाम के रूप में दर्ज करता है। यही कारण है कि कंपनियां ऐसे इंटरफेस बना रही हैं जो उपयोगकर्ता की मदद करने के बजाय उन्हें उलझाने के लिए डिज़ाइन किए गए हैं।

बैंकिंग: निजी बैंकों में बढ़ता असंतोष

आरबीआई लोकपाल (RBI Ombudsman) की FY25 की रिपोर्ट के अनुसार, बैंकों के खिलाफ शिकायतों में 13.55% की वृद्धि हुई है। दिलचस्प बात यह है कि एआई अपनाने में आगे रहने वाले निजी क्षेत्र के बैंकों का हिस्सा कुल शिकायतों में 37.53% रहा, जो सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों (34.8%) से अधिक है।

सबसे खतरनाक स्थिति धोखाधड़ी की रिपोर्टिंग में आती है। वित्तीय धोखाधड़ी के शिकार लोगों को अक्सर “धोखाधड़ी की रिपोर्ट करें” विकल्प खोजने के लिए जटिल आईवीआर पेड़ों से गुजरना पड़ता है, जिससे कीमती समय बर्बाद होता है।

बुजुर्गों और कम डिजिटल ज्ञान वालों का बहिष्कार

सितंबर 2024 में मुंबई में कंज्यूमर गाइडेंस सोसाइटी ऑफ इंडिया (CGSI) द्वारा किए गए एक सर्वेक्षण में सामने आया कि 53% वरिष्ठ नागरिक डर और कौशल की कमी के कारण डिजिटल बैंकिंग से बचते हैं। जब फोन सपोर्ट भी एक भूलभुलैया बन जाता है, तो ये लोग अनजाने में गूगल पर मौजूद फर्जी कस्टमर केयर नंबरों का शिकार बन जाते हैं।

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टेलीकॉम और ‘चीट कोड’ संस्कृति

भारतीय टेलीकॉम क्षेत्र में, जहाँ प्रतिस्पर्धा कम है, कंपनियां एआई को एक लागत कवच के रूप में उपयोग कर रही हैं। ट्राई (TRAI) के नियमों के बावजूद, “एजेंट से बात करें” का विकल्प अक्सर 7-8 मिनट के लंबे इंतजार के बाद आता है।

इसी वजह से अब भारत में “चीट कोड” संस्कृति पनप रही है। लोग सोशल मीडिया पर ऐसे तरीके साझा करते हैं जिनसे सिस्टम को “हैक” किया जा सके—जैसे बिलिंग समस्या बताने के लिए “सिम खो गया” विकल्प चुनना, क्योंकि कंपनियां नए कनेक्शन या सिम खोने जैसी श्रेणियों को प्राथमिकता देती हैं।

भविष्य: क्या मानवीय सहायता अब एक ‘लक्जरी’ है?

ऐसा प्रतीत होता है कि हम एक ऐसे मॉडल की ओर बढ़ रहे हैं जहाँ मानवीय पहुंच केवल उन लोगों के लिए होगी जो मासिक शुल्क का भुगतान करेंगे। स्विगी (Swiggy) और जोमैटो (Zomato) जैसे ऐप पहले से ही भुगतान करने वाले ग्राहकों को “प्राथमिकता सहायता” (Priority Support) दे रहे हैं।

जैसे-जैसे कंपनियां ‘एजेंटिक एआई’ की ओर बढ़ रही हैं, यह डिजिटल दीवार और भी ऊंची होती जाएगी। आम आदमी के लिए, ग्राहक सेवा का भविष्य अब एक ऐसी मशीन से बात करना रह गया है जिसे आपको कभी भी इंसान तक न पहुंचने देने के लिए प्रोग्राम किया गया है।

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