भारतीय नौसेना में शामिल हुआ स्वदेशी युद्धपोत मंगरोल, बढ़ेगी समुद्री ताकत

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भारतीय नौसेना ने अपनी समुद्री सुरक्षा और पनडुब्बी रोधी युद्ध क्षमता को मजबूत करने की दिशा में एक और कदम उठाया है। कोचीन शिपयार्ड लिमिटेड (CSL) द्वारा निर्मित तीसरे एंटी-सबमरीन वारफेयर शैलो वॉटर क्राफ्ट (ASW-SWC) मंगरोल को सोमवार सुबह मुंबई स्थित नेवल डॉकयार्ड में नौसेना में शामिल किया गया। स्वदेशी तकनीक से तैयार यह पोत खास तौर पर तटीय और कम गहरे समुद्री क्षेत्रों में पनडुब्बियों से पैदा होने वाले खतरों का पता लगाने और उनका मुकाबला करने के लिए बनाया गया है।

इस युद्धपोत के शामिल होने से नौसेना की तटीय निगरानी और समुद्री परिचालन क्षमता को मजबूती मिलने की उम्मीद है। मंगरोल में 80 प्रतिशत से अधिक स्वदेशी सामग्री का इस्तेमाल किया गया है। यह भारत में युद्धपोतों के डिजाइन, निर्माण और आधुनिक हथियार प्रणालियों व सेंसर को एकीकृत करने की बढ़ती क्षमता को भी दर्शाता है।

गुजरात के तटीय शहर के नाम पर रखा गया पोत

मंगरोल का नाम गुजरात के जूनागढ़ जिले के तटीय शहर मंगरोल के नाम पर रखा गया है। यह शहर एक प्रमुख मछली पकड़ने वाले बंदरगाह के रूप में जाना जाता है। इस नाम के जरिए भारतीय नौसेना ने अपने पुराने युद्धपोतों की विरासत को आगे बढ़ाने की परंपरा जारी रखी है।

इससे पहले INS Mangrol (M85) नाम का एक माइनस्वीपर भारतीय नौसेना में सेवा दे चुका है। उसने 7 अप्रैल 2004 तक नौसेना में अपनी भूमिका निभाई थी। नए पोत का नामकरण उसी ऐतिहासिक विरासत को सम्मान देने की कड़ी है।

मेक इन इंडिया और आत्मनिर्भर भारत को बढ़ावा

मंगरोल का निर्माण कोचीन शिपयार्ड लिमिटेड ने केंद्र सरकार की ‘मेक इन इंडिया’ और ‘आत्मनिर्भर भारत’ पहलों के तहत किया है। पोत में 80 प्रतिशत से अधिक स्वदेशी सामग्री का इस्तेमाल देश की रक्षा उत्पादन क्षमता के विस्तार को दर्शाता है।

स्वदेशी युद्धपोतों के निर्माण से भारत को रक्षा उपकरणों और समुद्री प्लेटफॉर्म के लिए घरेलू तकनीक विकसित करने का अवसर मिलता है। मंगरोल जैसे पोतों में हथियार प्रणालियों, सेंसर और अन्य तकनीकी उपकरणों का एकीकरण भी देश की औद्योगिक और इंजीनियरिंग क्षमताओं को आगे बढ़ाता है।

आधुनिक सोनार और टॉरपीडो प्रणालियों से लैस

मंगरोल को तटीय तथा उथले समुद्री इलाकों में पानी के भीतर मौजूद खतरों का पता लगाने और उनका मुकाबला करने के लिए तैयार किया गया है। इसमें अभय हल-माउंटेड सोनार, हल्के टॉरपीडो, स्वदेशी एंटी-सबमरीन रॉकेट लॉन्चर और मारीच एडवांस्ड टॉरपीडो डिकॉय सिस्टम जैसे उपकरण लगाए गए हैं।

सोनार प्रणाली पानी के भीतर मौजूद वस्तुओं और संभावित पनडुब्बी खतरों की पहचान करने में मदद करती है। वहीं, टॉरपीडो और रॉकेट लॉन्चर जैसी प्रणालियां पनडुब्बी रोधी अभियानों में उपयोगी होती हैं। मारीच डिकॉय सिस्टम टॉरपीडो से उत्पन्न खतरे के खिलाफ पोत की सुरक्षा में सहायता देने के लिए बनाया गया है।

उथले पानी में तेज और प्रभावी परिचालन क्षमता

यह युद्धपोत तीन डीजल इंजनों से संचालित होता है और इसमें वाटरजेट प्रणोदन प्रणाली का इस्तेमाल किया गया है। यह व्यवस्था पोत को कम गहरे पानी में बेहतर गतिशीलता और संचालन क्षमता प्रदान करती है।

मंगरोल पनडुब्बी रोधी अभियानों के अलावा पानी के भीतर निगरानी, कम तीव्रता वाले समुद्री अभियानों और समुद्री बारूदी सुरंगों से संबंधित कार्यों में भी इस्तेमाल किया जा सकता है।

तटीय सुरक्षा में मिलेगी अतिरिक्त मजबूती

बड़े युद्धपोतों के लिए कुछ उथले तटीय क्षेत्रों में संचालन करना सीमित हो सकता है। ऐसे इलाकों में मंगरोल जैसे छोटे और विशेष उद्देश्य वाले पोत महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। यह समुद्री गश्ती विमानों, हेलीकॉप्टरों और अन्य युद्धपोतों के साथ मिलकर पनडुब्बियों का पता लगाने और उनसे निपटने के अभियानों में हिस्सा ले सकता है।

इसके नौसेना में शामिल होने से बंदरगाहों, समुद्री ठिकानों और तटीय प्रवेश मार्गों की सुरक्षा मजबूत करने में मदद मिलेगी। साथ ही, यह भारतीय नौसेना के व्यापक बेड़े के अभियानों को भी सहयोग देगा।

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