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अंतहीन शीतकाल: 36वें ‘निष्कासन दिवस’ पर वापसी की उम्मीदों पर संशय

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SamacharToday.co.in - अंतहीन शीतकाल 36वें 'निष्कासन दिवस' पर वापसी की उम्मीदों पर संशय - Image Credited by The Economic Times

जम्मू — रविवार की शाम जैसे ही जगती टाउनशिप के ऊपर सूरज ढला, हवा में जलती हुई लकड़ियों की महक और प्राचीन प्रार्थनाओं की गूंज भर गई। लेकिन इस आध्यात्मिक उत्साह के पीछे एक दशकों पुराना आक्रोश छिपा था। अपने बड़े पैमाने पर विस्थापन की 36वीं वर्षगांठ की पूर्व संध्या पर, हजारों कश्मीरी पंडितों ने जम्मू-श्रीनगर राष्ट्रीय राजमार्ग को जाम कर दिया, और “अलग मातृभूमि” के उनके नारे नगरोटा की ठंडी पहाड़ियों में गूंज उठे।

इस विरोध प्रदर्शन का समय अत्यंत मार्मिक था। 19 जनवरी को समुदाय द्वारा ‘निष्कासन दिवस’ (Exodus Day) या ‘होलोकॉस्ट डे’ के रूप में मनाया जाता है—यह 1990 की उस सर्द रात की याद दिलाता है जब पाकिस्तान प्रायोजित उग्रवाद ने कश्मीर घाटी से लगभग पूरी अल्पसंख्यक आबादी को बाहर निकलने पर मजबूर कर दिया था।

हालांकि, सोमवार को नेशनल कॉन्फ्रेंस (NC) के अध्यक्ष और पूर्व मुख्यमंत्री फारूक अब्दुल्ला के बयानों ने बहस की एक नई लहर पैदा कर दी। उन्होंने यह तो कहा कि पंडितों का वापस लौटने के लिए “हमेशा स्वागत” है, लेकिन एक ऐसी स्पष्ट शंका भी व्यक्त की जिसने समुदाय के भावनात्मक घावों को हरा कर दिया: उन्हें नहीं लगता कि अब यह समुदाय घाटी में स्थायी रूप से रहना चाहता है।

कहीं और बसा समुदाय: पीढ़ीगत बदलाव

जम्मू में पार्टी के दो दिवसीय कार्यक्रम के दौरान पत्रकारों से बात करते हुए अब्दुल्ला का लहजा स्वागत और व्यावहारिक संदेह का मिश्रण था। “उन्हें कौन रोक रहा है? कोई उन्हें नहीं रोक रहा। उन्हें वापस आना चाहिए, क्योंकि यह उनका घर है,” उन्होंने कहा। फिर भी, उन्होंने निर्वासन के 36 वर्षों की जनसांख्यिकीय और सामाजिक वास्तविकता की ओर इशारा किया।

अब्दुल्ला ने तर्क दिया कि विस्थापन की लंबी अवधि ने नई जड़ें पैदा कर दी हैं। “वे अब बुजुर्ग हो गए हैं; कई का इलाज चल रहा है, और उनके बच्चे देश के अलग-अलग हिस्सों में कॉलेजों, स्कूलों और विश्वविद्यालयों में पढ़ रहे हैं। उन्होंने वहां अपनी जिंदगी और घर बना लिए हैं। वे शायद घूमने आएं, लेकिन मुझे नहीं लगता कि वे वहां स्थायी रूप से रहने के लिए लौटेंगे,” उन्होंने टिप्पणी की।

जगती विरोध: अलग मातृभूमि की मांग

इस तरह के संदेह पर समुदाय की प्रतिक्रिया जगती की सड़कों पर साफ दिखाई दे रही थी। ‘यूथ 4 पनुन कश्मीर’ के बैनर तले सैकड़ों प्रदर्शनकारियों ने बन टोल प्लाजा पर यातायात ठप कर दिया। उनकी मांगें स्पष्ट और अडिग थीं:

  1. अलग मातृभूमि: घाटी के भीतर केंद्र शासित प्रदेश के दर्जे वाला एक विशेष क्षेत्र, जहाँ पांच लाख से अधिक निर्वासित पंडितों को फिर से बसाया जा सके।

  2. नरसंहार की मान्यता: संसद में एक विधेयक पारित कर 1990 के विस्थापन और लक्षित हत्याओं को आधिकारिक तौर पर ‘नरसंहार’ (Genocide) घोषित किया जाए।

  3. मंदिर और तीर्थस्थल विधेयक: घाटी में हिंदू धार्मिक स्थलों की सुरक्षा और बहाली के लिए कानून।

कश्मीर के नेता विट्ठल चौधरी ने पूछा, “इससे बड़ा विरोधाभास क्या हो सकता है कि लाखों कश्मीरी हिंदू एक रात में अपने ही देश में शरणार्थी बन गए और सरकार मूकदर्शक बनी रही?”

टूटे हुए वादों की पृष्ठभूमि

मौजूदा गतिरोध को समझने के लिए ऐतिहासिक आंकड़ों पर गौर करना जरूरी है। 1990 से पहले, घाटी में पंडितों की आबादी लगभग 1.4 लाख थी। उग्रवाद के बाद, 2.5 लाख से अधिक लोग पलायन कर गए। आज, गृह मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, केवल एक छोटा हिस्सा—लगभग 800 परिवार या 4,000 व्यक्ति—घाटी में रह रहे हैं, जिनमें से अधिकांश प्रधानमंत्री विशेष रोजगार पैकेज के तहत वहां तैनात हैं।

अब्दुल्ला ने पुनर्वास का सारा बोझ केंद्र सरकार पर डालते हुए दावा किया कि उनके प्रशासन ने आवास परियोजनाओं का प्रस्ताव दिया था, जो उनकी पार्टी की सत्ता जाने के बाद ठंडे बस्ते में डाल दिए गए। उन्होंने कहा, “अब दिल्ली (केंद्र सरकार) को इस पर फैसला लेना है।”

विशेषज्ञ दृष्टिकोण: भाईचारा बनाम सुरक्षा

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि अब्दुल्ला की “यात्रा” वाली थ्योरी और पंडितों की “मातृभूमि” वाली मांग के बीच की खाई ही असली विवाद है। जम्मू-कश्मीर मामलों के विशेषज्ञ डॉ. सुधीर सिंह कहते हैं:

“कश्मीरी पंडितों की वापसी केवल आवास का मुद्दा नहीं है; यह सुरक्षा और मनोवैज्ञानिक मुद्दा है। जहां नेशनल कॉन्फ्रेंस ‘साझा संस्कृति’ (कश्मीरियत) और मूल गांवों में वापसी पर जोर देती है, वहीं समुदाय को डर है कि एक सुरक्षित क्षेत्र के बिना वे लक्षित हत्याओं के प्रति संवेदनशील रहेंगे। अब्दुल्ला का संदेह जमीनी हकीकत का प्रतिबिंब हो सकता है, लेकिन पंडितों के लिए यह उनकी वापसी के अधिकार को मिटाने जैसा महसूस होता है।”

जैसे ही घाटी उस “लंबी सर्दियों” के 36 साल पूरे कर रही है, सवाल वही बना हुआ है: क्या कश्मीर अपने पंडितों के बिना अधूरा है, या समय बीतने के साथ यह विस्थापन अपरिवर्तनीय हो गया है?

मेरा नाम युवराज है। मैं एक अनुभवी पत्रकार एवं स्टेट न्यूज़ एडिटर हूँ, जिसे राज्य स्तरीय राजनीति, प्रशासनिक गतिविधियों और जनहित से जुड़े मुद्दों की रिपोर्टिंग व संपादन का व्यापक अनुभव है। मैं समाचारों को तथ्यपरक, संतुलित और निष्पक्ष दृष्टिकोण के साथ प्रस्तुत करने में विश्वास रखता हूँ। मेरा मानना है कि पत्रकारिता केवल सूचना देने का माध्यम नहीं, बल्कि समाज को जागरूक करने और सकारात्मक बदलाव की दिशा में प्रेरित करने की एक महत्वपूर्ण जिम्मेदारी भी है। अपने कार्य के माध्यम से मैं पाठकों तक सटीक जानकारी पहुँचाने और लोकतांत्रिक मूल्यों को मजबूत करने का प्रयास करता हूँ।

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