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इजरायल में 27 अक्टूबर को होंगे संसदीय चुनाव, नेतन्याहू मैदान में
इजरायल की संसद केनेसट ने घोषणा की है कि देश में 27 अक्टूबर 2026 को संसदीय चुनाव कराए जाएंगे। यह चुनाव प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के नेतृत्व और गाजा युद्ध के दौरान उनकी सरकार के प्रदर्शन पर जनता की राय जानने के लिहाज से बेहद अहम माना जा रहा है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह चुनाव देश की भविष्य की राजनीतिक दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।
केनेसट के मौजूदा कार्यकाल की अंतिम बैठक शुक्रवार को होगी। इसके साथ ही नेतन्याहू के नेतृत्व वाली गठबंधन सरकार लगभग पांच दशक बाद पहली ऐसी सरकार बन जाएगी, जिसने अपना चार वर्षीय कार्यकाल पूरा किया है। संसद की ओर से जारी बयान में कहा गया है कि कार्यकाल समाप्त होने से पहले संसद भंग करने का कोई प्रस्ताव नहीं लाया गया, क्योंकि चुनाव की तारीख पहले ही तय कर दी गई है।
इजरायल के सबसे लंबे समय तक प्रधानमंत्री रहने वाले बेंजामिन नेतन्याहू ने जून में पुष्टि की थी कि वह आगामी चुनाव में फिर से अपनी किस्मत आजमाएंगे। 76 वर्षीय नेतन्याहू को 7 अक्टूबर 2023 को हमास द्वारा किए गए हमलों के बाद लगातार आलोचनाओं का सामना करना पड़ा है। इन हमलों को इजरायल के इतिहास का सबसे घातक हमला माना जाता है, जिसमें बड़ी संख्या में लोगों की जान गई और 251 लोगों को बंधक बना लिया गया था।
विपक्षी दलों और सरकार के आलोचकों का आरोप है कि सुरक्षा व्यवस्था में गंभीर चूक के कारण हमास के लड़ाके इजरायल की सीमा सुरक्षा को भेदने में सफल रहे। इसके बाद शुरू हुए गाजा युद्ध ने देश की राजनीति और सुरक्षा व्यवस्था को गहराई से प्रभावित किया। विपक्ष लगातार सरकार की नीतियों और युद्ध प्रबंधन को चुनावी मुद्दा बना रहा है।
इस चुनाव में नेतन्याहू के सामने सबसे बड़ी चुनौती पूर्व इजरायली रक्षा बल (आईडीएफ) प्रमुख गादी आइजनकोट माने जा रहे हैं। हाल ही में इजरायली समाचार चैनल चैनल 13 द्वारा जारी जनमत सर्वेक्षण के अनुसार, आइजनकोट की याशार पार्टी को नेतन्याहू की लिकुड पार्टी पर मामूली बढ़त मिलती दिखाई दे रही है। हालांकि चुनाव में अभी कई महीने शेष हैं और राजनीतिक समीकरण बदल सकते हैं।
गादी आइजनकोट पहले नेतन्याहू के युद्ध मंत्रिमंडल का हिस्सा थे, लेकिन उन्होंने जून 2024 में इस्तीफा दे दिया था। इस्तीफे के समय उन्होंने आरोप लगाया था कि सरकार गाजा में अपने घोषित उद्देश्यों को हासिल करने में विफल रही है। इसके बाद से वह सरकार की नीतियों के मुखर आलोचक बनकर उभरे हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि आगामी चुनाव केवल सत्ता परिवर्तन का नहीं, बल्कि इजरायल की सुरक्षा नीति, गाजा युद्ध की रणनीति और क्षेत्रीय कूटनीति की दिशा तय करने वाला चुनाव भी होगा। चुनाव परिणाम यह भी स्पष्ट करेंगे कि देश की जनता मौजूदा नेतृत्व पर भरोसा कायम रखना चाहती है या फिर नए राजनीतिक विकल्प को अवसर देना चाहती है। अंतरराष्ट्रीय समुदाय की भी इस चुनाव पर करीबी नजर रहेगी, क्योंकि इसके परिणामों का प्रभाव पूरे मध्य पूर्व की राजनीतिक और सुरक्षा परिस्थितियों पर पड़ सकता है।
